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समाचार ब्यूरो
03/04/2017  :  09:56 HH:MM
रोमियो नहीं हैवानियत का डर
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रो मियो फिर से चर्चा में है। शेक्सपियर के दुखांत कथानक का ये पात्र इक्कीसवीं सदी में अचानक जीवित हो उठेगा किसी ने शायद ही सोचा होगा। लेकिन ये सचाई है। रोमियो फिर से हमारे बीच मे है नए वर्सन के साथ। पता नही ये रोमियो का भूत है या फिर समय की पीड़ा ने उसे खलनायक बना दिया। अब वो किसी प्रेमिका जूलियट के लिए अपनी जान नही देता बल्कि छेडख़ानी के आरोप में सडक़ों पर डंडे खाता है। कान पकडक़र उठक बैठक करता है। कोई जूलियट उसके लिए मरेगी ये तो सोचना भी गुनाह है। टुच्चा हो चुका है आज का रोमियो।

खैर उत्तरप्रदेश में योगी राज के दौरान जिंदा हुआ रोमियो पुलिस के लिए सबसे चुनौती भरा पात्र है। इसका असर इतना जबरदस्त है कि क्या उत्तरप्रदेश अब तो देश के ज्यादातर राज्य सीना तानकर इस रोमियो के छक्के छुड़ाने के आदेश दे रही हैं। एक रोमियो को पकडऩे के लिए पूरा दस्ता सडक़ों पर निकलता है। आंखों में देखकर पुलिस को पहचानना पड़ता है कि रोमियो कितना बदजात है। पकड़ में आये तो कितनी दवाई और कैसी दवाई करनी है इसकी भी बाकायदा ट्रेनिंग हो रही है। जो भी हो यूपी से निकला संदेश पूरे देश मे जाता है। सो संदेश चला गया। बेटा रोमियो बनना तो दूर उसकी शक्ल में भी नजर मत आना वरना ऐसी कुटाई होगी कि जन्म जन्मांतर याद रखोगे। व्यंग्य,कटाक्ष की भाषा समझने वाले लोग मेरा आशय समझ गए होंगे। लेकिन कुछ बात सीधी सपाट भी करनी है। नाम के भ्रम को छोडक़र असल उद्देश्य की बात करें तो एन्टी रोमियो स्क्वाड उत्तरप्रदेश में हो या हमारे हरियाणा में बने या फिर किसी अन्य सूबे में। उसकी असल चिंता ये होनी
चाहिए कि प्रदेश में लड़कियों की सुरक्षा से कोई खिलवाड़ न हो। स्कूल,कॉलेज जाने वाली बेटियां खुद को असुरक्षित महसूस न करें। कोई भी असभ्य मनचला किसी लडक़ी की गरिमा से खिलवाड़ न करे। ये सीमित उद्देश्य है। इससे भी बड़ी बात ये है कि बलात्कार और यौन उत्पीडऩ की घटनाएं रुकें। और ये दस्ता ऐसे लोगों के खिलाफ अभियान चलाए जो महिलाओं की अस्मत को लूटना अपना शौक और पुरुषत्व की निशानी मानते हैं। इन वहशियों को सजा सडक़ पर दी या कानून के कठघरे में खड़ा किया जाए सजा जरूर मिलनी चाहिए। उत्तरप्रदेश ही नही देश मे इस तरह का तंत्र विकसित होना चाहिए जिससे महिलाओं, बेटियों की इज्जत,उनकी मर्यादा और अस्मत से खेलने की सोचने वालों की रूह कांप जाए। लेकिन ये काम बड़े उद्देश्य,विजन और तैयारी के साथ होना चाहिए। ये कैमरे में तमाशा खड़ा करके संभव नही होगा। पार्क में बैठे जोड़ो को पकडक़र भी ये संभव नही हो सकता। सही मायने में कानून का राज कायम करना है तो सभी थानों में हिस्ट्रीशीटर की लिस्ट निकालकर उन्हें कानून की ताकत का एहसास करना होगा। सडक़ों पर सरेआम गुंडई करने वालों को जेल भेजने की कवायद शुरू करनी होगी। सडक़ पर छिछोरों को तो ठिकाने लगाना अच्छी बात है लेकिन बड़ी बड़ी मछलियां जिनके नाम पर लोग दहशत में रहते हैं उनको जेल की सींखचों में भेजकर उनका इलाज करना होगा। क्योंकि इनका नाम लेकर महिलाओं,आम लोगों,गरीब व कमजोर वर्ग के लोगों को परेशान करना आम बात है। थानों की दलाली बंद करनी होगी। ऐसा सिस्टम बने कि अपराधी दहशत में हों और आम आदमी खुद को ताकतवर महसूस करे। मुझे उम्मीद है कि सरकारें प्रतीक,संकेत से आगे निकलकर बड़े उद्देश्य का मर्म समझकर सिस्टम को बदलने के लिए तैयार होंगी।

पुलिस मॉरल पोलिसिंग न करे। बजरंग दल और हिन्दू सेना की दूत बनकर काम न करे। हां पुलिस को ये काम जरूर करना होगा कि उसके प्रोफेशनलिस्म की ताकत से गुंडों की हिम्मत पस्त हो जाये। इसके लिए एन्टी रोमियो स्क्वाड की बजाए महिला शक्ति वाहिनी जैसा कुछ बना सकते हैं। ये नाम सरकार को संस्कृति से भी जुड़ा नजर आएगा। इसके अंतर्गत महिलाओं,बेटियों को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण और गलत का विरोध करने का साहस दिलाने के लिए प्रशिक्षण और जज्बा प्रदान करने का भी इंतजाम होना चाहिए। इसके लिए हमारी पुलिस का व्यवहार बदलना ही सबसे बड़ी चुनौती है। दरअसल रोमियो और रुमानियत से नही वहशियत,
हैवानियत से बड़ी लड़ाई लडऩी है। सोच,व्यवहार बदलकर और सिस्टम में आमूल परिवर्तन से ही ये संभव है। वर्ना खुशी तब तक ही नजर आएगी जब तक कैमरा हिलाने डुलाने वाले और इनके नियंता खुश होकर कहते नजर आएंगे बागों में बहार है।






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