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समाचार ब्यूरो
06/04/2017  :  10:30 HH:MM
आरटीआई को ना छेड
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ये कोशिश पूर्व यूपीए सरकार ने भी की थी। लेकिन तब सिविल सोसायटी के जोरदार आंदोलन के कारण उसे कदम वापस खींचने पड़े थे। अब वही इरादा लेकर केंद्र की एनडीए सरकार भी आगे बढ़ती दिखती है। लेकिन ना सिर्फ सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता के हित में, बल्कि खुद अपनी छवि की चिंता करते हुए भी- उसे इस कोशिश से बाज आना चाहिए।

राजनीतिक दलों को कॉरपोरेट चंदे को गोपनीय बना कर वह पहले ही तीखी आलोचना आमंत्रित कर चुकी है। आरटीआई नियमों में प्रस्तावित बदलाव हुए, तो प्रशासनिक पारदर्शिता के प्रति सरकार की निष्ठा पर गहरे सवाल उठेंगे। गौरतलब है कि सरकार ने आरटीआई के तहत कई नए नियम तैयार किए हैं। इसके मसविदे को बीते 31 मार्च को कार्मिक मंत्रालय की वेबसाइट पर डाला गया। इस बारे में आम लोगों से राय मांगी गई है। इसके लिए 15 अप्रैल तक का समय दिया गया है। लेकिन आरटीआई कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि प्रस्तावित मसविदे के बारे में कोई सरकारी प्रेस विज्ञप्ति जारी नहीं की गई। ऐसे में लोगों को कैसे पता चलेगा कि उनकी राय जानने के लिए ऐसा कोई दस्तावेज वेबसाइट पर डाला गया है? दो प्रस्तावित बदलावों को लेकर सबसे ज्यादा आशंका जताई जा रही है। इसमें से एक के तहत सूचना मांगने वाले को यह अधिकार दिया जाएगा कि वह चाहे तो सूचना आयोग की इजाजत से अपनी अर्जी वापस ले सकता है। दूसरे परिवर्तन के तहत
यह नियम प्रस्तावित किया गया है कि अर्जी दायर करने वाले की मौत होने पर उस आरटीआई प्रक्रिया को समाप्त कर दिया जाएगा। आरटीआई कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसा हुआ तो निहित स्वार्थी दबंग लोग दबाव डालकर अर्जियां वापस कराने लगेंगे। सूचना मांगने वाला इसके लिए राजी नहीं हुआ, तो उसकी हत्या की आशंका रहेगी। उल्लेखनीय है कि यह कानून लागू होने के बाद से 56 आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है। एक और बदलाव यह प्रस्तावित है कि केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) को यह अधिकार दिया जाएगा कि वह किसी भी शिकायत को दूसरी अपील का दर्जा दे सकता है। इस तरह सूचना मांगने की प्रक्रिया बिल्कुल आरंभिक स्तर पर पहुंच जाएगी। एक अन्य प्रावधान यह प्रस्तावित है कि शिकायतकर्ता को सीआईसी के पास जाने से पहले शिकायत और अपील की कॉपी केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (सीपीआईओ) में पेश करनी होगी। ये सारे प्रस्ताव विवादास्पद हैं। इन्हें अमल में ना लाना ही उचित है।






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