हरियाणा मेल ब्यूरो
10/04/2017  :  18:56 HH:MM
प्रसंगवश : रायसीना हिल पर कौन होगा मोदी की पसंद?
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रा ष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद का चुनाव नजदीक आ रहा है। सत्तापक्ष में हलचल शुरू हो गई है। एनडीए की बैठक इसी मकसद से बुलाई गई है। रायसीना हिल पर कौन जाएगा और मौलाना आज़ाद रोड पर किसका आशियाना सजेगा इसकी चर्चा तब तक होगी जब तक नाम तय न हो जाएं।

लेकिन एक तश्वीर साफ़ नजर आ रही है कि इस बार बाजीगर वही होगा जिसके नाम पर बाजी सरकार लगाएगी। यूपी चुनाव की प्रचंड जीत के बाद सत्ता पक्ष का मनोबल बढ़ा हुआ है। मतों का अंकगणित भी काफी हद तक एनडीए के पक्ष में है। लेकिन सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अगर कुछ है तो वो है अपने कुनबे को साधे रखना। शिवसेना लगातार सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति पर चल रही है। महाराष्ट्र में तू तू मैं मैं थमने के बाद भी शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे शायद ही कोई मौका चूकते हों जब वे केंद्र में मोदी सरकार को नसीहत न दें। पार्टी के एक सांसद द्वारा एयर इंडिया के स्टाफ की पिटाई के मामले में भी सरकार पर दबाव बनाया गया। शायद चुनाव में सहयोगी दल के साथ की जरुरत को भांपते हुए ही सरकार ने इस मामले को निपटाने का रास्ता चुना। बावजूद इसके चुनाव जितने नजदीक आएंगे सेना का मोलभाव बढ़ता जाएगा। शिवसेना का इतिहास भी सरकार को सांसत में डालने वाला है। मराठी राष्ट्र्पति के नाम पर भाजपा से अलग प्रतिभा देवी पाटिल का समर्थन करने का निर्णय पार्टी ने 2007 में किया था। उस वक्त भाजपा ने भैरो सिंह शेखावत पर दांव लगाया था। खांटी सियासतदां शेखावत की शख्सियत पर यूपीए का राजनीतिक प्रबंधन भारी पड़ा था। लेकिन ये सच है कि अब राजनीति का चक्र बदल चुका है। समय का पहिया मोदी नाम केवलम के इर्द गिर्द घूम रहा है। उनके सारथि के रूप में अमित शाह ने राजनीतिक प्रबंधन की नई परिभाषा गढ़ी है। इस वक्त सब कुछ वही हो रहा है जो वो चाहते हैं। इसलिए सबको उम्मीद यही है कि शिवसेना बेहद कमजोर नजर आ रहे विपक्ष का दामन थामने की गलती शायद न करे। मराठी मानुष के नाम पर उसका दांव भी शायद इस बार नहीं चलेगा।

भाजपा शायद अपनी रणनीति इस तरह से बना चुकी होगी कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों उनका ही बने। कौन बने ये भी शायद मोदी और अमित शाह के मन में होगा। चर्चा है कि वे किसी दलित को राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति पद पर भेज सकते हैं। केंद्रीय मंत्री थावर चंद गहलौत का नाम लिया जा रहा है। थावर चंद अभी सरकार में सामाजिक कल्याण व अधिकारिता मंत्रालय में मंत्री हैं। अगर किसी दलित को सरकार देश के शीर्ष पदों के लिए चुनती है तो इसका संदेश बहुत गहरा होगा। प्रधानमंत्री मोदी जब से सत्ता में आये हैं उन्होंने अलग अलग तरीकों से ये प्रयास किया है कि वे दलितों को भाजपा के पक्ष में साध पाएं। बाबा साहब आंबेडकर से जुड़े सभी प्रतीकों को सरकार ने अहमियत दी है। इसलिए लोगों को बहुत अचम्भा नहीं होना चाहिए अगर वे ऐसी ही प्रतीकात्मक राजनीति का संदेश शीर्ष पद पर दें। दलित उम्मीदवार का विरोध करना किसी भी दल के लिए आसान नहीं होगा।

दूसरी चर्चा किसी महिला के चुनाव की भी है। इस कड़ी में प्रमुखता से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का नाम लिया जा रहा है। चर्चा है कि सुषमा स्वराज खुद भी विदेश मंत्रालय के थकाऊ काम से थोड़ा आराम चाहती हैं। पिछले दिनों वे खऱाब स्वास्थ्य से उबरी हैं। इसलिए इस तरह की चर्चाएं ज्यादा हैं। इन चर्चाओं के बीच एक बड़ी सम्भावना को नकारना राजनीतिक हकीकत से मुंह मोडऩा होगा। प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष के पद पर गुजरात के दबदबे के बाद राष्ट्रपति पद के लिए स्वाभाविक दावेदार गुजरात से ही आने वाले लालकृष्ण आडवाणी भी हैं। आडवाणी जी की वरिष्ठता और भाजपा को खड़ा करने में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें सीधे तौर पर नकार पाना भाजपा नेतृत्व के लिए आसान नही होगा। हां संघ का सहारा आडवाणी के अलावा किसी और को मिल जाए तो एक बहाना मोदी - शाह के लिए जरूर होगा। दौड़ में मुरली मनोहर जोशी से लेकर वेंकैया नायडू तक के नाम लिए जा रहे हैं। कलाम की तरह भाजपा का अगर कोई सरप्राइज हो तो उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए। इंतजार कीजिये। विपक्ष में कौन टूटा कौन जुड़ा ये चर्चाएं भी चुनाव के दौरान होंगी। कई दिलचस्प राजनीतिक घटनाक्रम नजर आ सकते हैं। लेकिन देश के लिए यही अच्छा होगा कि रायसीना हिल या मौलाना आज़ाद रोड पर कोई राजनीतिक समझ वाला, संविधान का जानकार और सरकार का स्टाम्प बनने के बजाये अपने विवेक का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति विराजमान हो। लेकिन सरकार का विवेक क्या है देखना होगा। -जयहिंद





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