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हरियाणा मेल ब्यूरो
14/04/2017  :  10:44 HH:MM
पस्त विपक्ष का साक्षी
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संसद के बजट सत्र में कई खास बातें हुईं। मसलन, रेल बजट अलग से पेश करने की परंपरा खत्म हुई। बजट फरवरी के आखिरी के बजाय प्रथम दिन पेश हुआ। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से संबंधित बिल पारित हुए। मानसिक रोगियों तथा एचआईवी-एड्स के मरीजों के प्रति नई सामाजिक संवेदनशीलता को दर्शाने वाले विधेयकों को मंजूरी मिली।

वित्तीय एवं वैधानिक क्षेत्रों में इन तमाम विधायी कार्यों का दूरगामी असर होगा। लेकिन राजनीतिक तौर पर इस सत्र को विपक्ष की पस्ती के लिए याद रखा जाएगा। सत्र हमेशा की तरह दो हिस्सों में हुआ। इन दो हिस्सों के बीच उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव नतीजे आ गए। वहां भाजपा की विशाल जीत ने देश के राजनीतिक परिदृश्य को बदला, तो उसकी झलक संसद में भी देखने को मिली। नतीजतन, 9 मार्च से शुरू हुए बजट सत्र के दूसरे हिस्से में सरकार के लिए स्थितियां अनुकूल नजर आईं। इतना कि वित्त विधेयक के साथ 40 संशोधन पास कराने के उसके विवादास्पद कदम पर भी कोई प्रभावी प्रतिरोध नहीं दिखा। जबकि इन संशोधनों के तहत कॉरपोरेट राजनीतिक चंदे का पूरा स्वरूप ही बदल दिया गया।

विपक्ष की धीमी पड़ी आवाज को समझा जा सकता है। संसदीय लोकतंत्र में संसद बेशक विधायी कार्यों की संस्था है, लेकिन सियासी तौर पर यह ऐसा मंच है, जहां से पार्टियां राजनीतिक कथानक बनाने और प्रचारित करने की कोशिश करती हैं। उप्र के चुनाव नतीजों ने जाहिर किया कि गुजरे तीन वर्षों में विपक्ष ने जो कथानक बनाए, उनका मतदाताओं पर असर नहीं हुआ। जबकि नोटबंदी जैसा व्यापक असर डालने वाला फैसला लेने तथा आर्थिक मोर्चों पर उपलब्धियों की कमी के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वोट खींचने की क्षमता अक्षुण्ण बनी रही। ऐसे में विपक्षी दलों को पुराने कथानक के साथ तथा तौर-तरीकों के अनुरूप चलना व्यर्थ महसूस हुआ हो, तो इसमें कोई हैरत नहीं है। तो कुल मिलाकर बजट सत्र यह संदेश देते हुए खत्म हुआ कि फिलहाल नरेंद्र मोदी सरकार सियासी चुनौतियों से मुक्त है। दूसरी तरफ विपक्ष किंकर्त्तव्यविमूढ़ की अवस्था में है। इस हाल का सरकार ने भरपूर लाभ उठाया। अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने में वह सफल रही। उसे जरूर उम्मीद होगी कि जब मानसून सत्र के लिए संसद बैठेगी, तब भी इस सूरत में ज्यादा बदलाव नहीं होगा। बहरहाल, इससे यह पैगाम भी गया है कि अब किसी नाकामी का ठीकरा विपक्ष पर फोडऩे का अवसर भी उसके पास नहीं है।






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