हरियाणा मेल ब्यूरो
17/04/2017  :  10:34 HH:MM
धरती के स्वर्ग को नरक मत बनने दीजिये
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क श्मीर रो रहा है। धरती के स्वर्ग पर एक के बाद एक नारकीय घटनाएं हो रही हैं। कभी घाटी के हमारे नवजवान मारे जा रहे हैं तो कभी हमारी धरती को अपनी जांबाजी से सुरक्षित रखने वाले जवानो की जान जा रही है।

सेना की गाड़ी के आगे किसी युवक को जबरन बैठाकर ले जाने की घटना सिस्टम पर सवाल खड़ा करती है। तो सरेआम कुछ बिगड़ैल युवाओं का सुरक्षा बल के जवानों को थह्रश्वपड़ मारना घाटी के खूबसूरत इतिहास को कलंकित करने से कम नही। एक बात सबको कान खोलकर सुन लेनी चाहिए कि जम्मू कश्मीर हिंदुस्तान का अभिन्न हिस्सा है। इस मर्यादा के भीतर ही सबको शासन प्रशासन भी चलाना है। और इसी गरिमा को जेहन में जिंदा रखते हुए अपने हक़ भी मांगे जा सकते हैं। ये दोनों तरफ के लिए बुनियादी सचाई है। जब हम ये जिम्मेदारी के साथ कहते हैं तो हमारे सिस्टम का दायित्व सबसे ज्यादा बढ़ जाता है कि हम घाटी के हर  नागरिक को संदेह की नजर से देखने की भूल न करें। अगर हम ऐसा करते हैं तो सबसे बड़ी भूल हम कर रहे होते हैं। जो भी लोग इस हकीकत को नकारने का भ्रम पालते हैं उनसे ही ऐसी गलतियां होती हैं जो पूरे राष्ट्र को अछम्य अपराध लगती हैं। सरकार चलाने वालों के साथ देश की रक्षा करने वाले जांबाजो को देखना होगा
कि वे किसी वजह से नागरिकों,युवाओं और बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार न करें जिससे लगे कि वे किसी दुश्मन सेना से लड़ रहे हैं। दुश्मनो से युद्ध भी मानवीय मूल्यों के सिद्धांत को दरकिनार करके लड़े जाते हैं तो उनपर सवाल उठते हैं। फिर घाटी के लोग तो अपने हैं। उनकी शिकायतें हो सकती हैं। कुछ लोग शिकायतों को दूर करने के लिए गुमराह हो सकते हैं। लेकिन ज्यादातर कश्मीरी जानता है कि वो भी हिंदुस्तान के जिगर का एक शानदार टुकड़ा है जिसे सियासी वजहों से कई तरह के दु:ख दर्द झेलना पड़ा है। कश्मीर के शानदार अतीत को कुछ लोग बार बार दागदार करने की कोशिश करते हैं। सूफिज्म का संदेश देने वाले लोग भला रक्त के ह्रश्वयासे कैसे हो सकते हैं। जो भी इस राह पर जा रहा होगा मान लीजियेगा वो गुमराह है। या वे किसी दूसरे राष्ट्र का मकसद पूरा करने के लिए मोहरा बन रहे हैं। हमें समझना होगा कि राजनीतिक लड़ाइयां बैलेट से लड़ी जा सकती हैं बुलेट से नहीं। हक़ और हुकूब का संघर्ष शांतिपूर्ण आंदोलनों से लड़ा जा सकता है। आज़ादी काम करने की हो सकती है। आज़ादी लोकतांत्रिक तरीके से सूबे का शासन चलाने की हो सकती है। आज़ादी मांग सकते हैं अपने पूरे सूबे को अपनी सुविधा के मुताबिक सजाने की। शिक्षा,स्वास्थ्य का हक़,धार्मिक आज़ादी भी हासिल करने की बात हो सकती है अगर कहीं कोई बाधा हो। लेकिन दुश्मन के इशारे पर भौगोलिक सीमाओं को बदलने की कोशिश को आज़ादी का नाम देना किसे गंवारा होगा। हमें समझना ही पड़ेगा की जिस दिन कश्मीर एक राष्ट्र के रूप में अलग होगा उसकी स्वतंत्रता पर काबिज होने के लिए साम्राज्यवादी चीन और आतंकी पाकिस्तान सामने खड़े नजर आएंगे। कश्मीर के अमन पसंद लोगों को समझना होगा कि आखिर उन्हें किस राह पर जाना है। क्या वे ऐसे लोगो का साथ देकर अमन की राह हासिल कर पाएंगे जिनकी सोच ही विभाजनकारी है। शायद नहीं। लेकिन यहाँ ये भी अहम् है कि सरकारों की भूमिका भरोसा कायम करने में महत्वपूर्ण होती है। लेकिन श्रीनगर का चुनाव गवाह है कि हमने इकबाल खो दिया है। सत्ता में बैठे लोग बंदूक की नोंक पर भरोसा नहीं जीत सकते। उन्हें लोगों के बीच जाना होगा। जम्मू कश्मीर के इतिहास में इतना कम मतदान कभी नहीं हुआ। इसकी वजह क्या है। लोग वोट के लिए निकलते और उन्हें जिसका शासन उखाड़ फेंकना होता कम से कम एक सीट पर उसके खिलाफ प्रचंड वोट देकर संकेत दे सकते थे। लेकिन लोग वोट डालने ही न निकले तो स्थिति गंभीर है। इसका मतलब है कि वे डरे हुए हैं। अलगाववाद और आतंक की बात करने वालों का प्रभाव संगीन लेकर घूमते जवानों के भरोसा कायम करने और डर समाप्त करने के अभियान पर भारी पड़ रहा है। दुर्भाग्य से मुी भर लोग अपनी नापाक हरकतों में कामयाब हो रहे हैं। शांति,अमन और प्रगति के पैरोकार खूबसूरत धरती को बर्बाद होते देखने को मजबूर हैं। ये स्थिति बदलने की जरुरत है। इसके लिए जो भी करना पड़े करना चाहिए। बातचीत से ही रास्ता निकलेगा इसमें भी कोई दो राय नहीं। इसलिए उन लोगों से बात शुरू करनी चाहिए जो घाटी में किसी न किसी तरीके से अपना प्रभाव रखते हैं।

हां बातचीत के लिए हथियार छोडऩे होंगे। जो लोग क़ानून तोड़ते हैं उनके लिए क़ानून काम करेगा। लेकिन अमन पसंद लोगो को साथ लेकर राजनीतिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से गुरेज करते रहे तो स्थिति बिगड़ती जायेगी। स्थानीय लोगों पर शांति बहाली की प्रक्रिया में भरोसा करना पड़ेगा। पाक परस्त लोग कश्मीरी नहीं हो सकते। पाकिस्तान की भाषा बोलने वालों या आईएस का झंडा लेकर चलने वालों की जुबान बंद करने की जिम्मेदारी भी स्थानीय लोग बखूबी निभा सकते हैं। सेना उन्हें सहयोग और सरंक्षण दे। देश के अलग अलग हिस्सों में मुख्यधारा में काम कर रहे कश्मीरी नागरिकों का सहयोग सरकार को लेना चाहिए। वे पत्रकार हों,नौकरशाह हों, व्यापारी हों या किसी अन्य पेशे में कार्यरत हों। इनसे बात कीजिये ठेकेदारों पर भरोसा मत कीजिये। अतिवाद की भाषा के बजाये सद्भाव का रास्ता हमें नई उम्मीद देगा। कुछ भी कीजिये लेकिन धरती के स्वर्ग को नरक मत बनने दीजिये। वर्ना इतिहास हमें माफ़ नहीं करेगा। हम कठिन दौर से गुजर रहे हैं। संवेदनशीलता और राष्ट्रीय जरुरत में तालमेल के साथ आगे बढऩे का रास्ता कश्मीरी ही दिखायेगा। भरोसा जरुरी है। -जय हिंद





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