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समाचार ब्यूरो
19/04/2017  :  09:37 HH:MM
तेलंगाना में मुस्लिम आरक्षण
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तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने यही दिखाया है कि देश की हालिया सियासी घटनाओं से उन्होंने कोई सीख नहीं ली है। वे उसी विमर्श में फंसे हुए हैं, जिसके खिलाफ बहुसंख्यक समुदाय का जनमत बागी तेवर अपनाए हुए है।

तेलंगाना विधानमंडल के दोनों सदनों ने रविवार को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में मुस्लिम समुदाय के पिछड़े तबकों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण बढ़ाने वाला विधेयक पारित कर दिया। तेलंगाना पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (शैक्षणिक संस्थानों में सीटों और राज्य सरकार की
सेवाओं में नियुक्तियों या पदों में आरक्षण) विधेयक-2017 का भारतीय जनता पार्टी के अलावा सभी दलों ने समर्थन किया। लेकिन वे समझने में नाकाम रहे कि इससे फिलहाल विधानसभा में सिर्फ पांच सीटों वाली भाजपा को अपना जनाधार फैलाने का एक बड़ा मुद्दा उन्होंने दे दिया है। फिर पारित विधेयक न्यायिक परीक्षण
में उतरेगा, यह संदिग्ध है।

इसी आशंका के मद्देनजर मुख्यमंत्री ने कहा कि वे राष्ट्रपति से इस कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में डालने का अनुरोध करेंगे। पहले ये प्रावधान था कि नौवीं अनुसूची में डाले गए कानूनों की संवैधानिकता पर अदालतें विचार नहीं कर सकतीं। लेकिन 2005 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने व्यवस्था दी कि संबंधित कानून से किसी के मूल अधिकार का हनन होता है, तो न्यायालय नौवीं अनुसूची में वर्णित कानून का भी परीक्षण कर सकते हैं। यानी यह कानून वास्तव में लागू होगा- ये तय नहीं है। जबकि भाजपा को इससे बड़ा राजनीतिक अवसर मिला है, यह स्पष्ट है। इस विधेयक के तहत अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण 6 से बढ़ाकर 10 फीसदी किया गया है।

बीसी-ई (मुस्लिम समुदाय के पिछड़े वर्गों) के लिए इसे 4 से 12 फीसदी किया गया है। नतीजतन, राज्य में कुल आरक्षण 62 प्रतिशत हो जाएगा। स्पष्टत: यह इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई व्यवस्था का उल्लंघन है। फिर भाजपा का कहना है कि ये विधेयक धर्म आधारित आरक्षण की बात करता है, जो असंवैधानिक
है। केंद्रीय मंत्री एम. वेंकैया नायडू ने कहा है कि धर्म आधारित आरक्षण से सामाजिक अशांति पैदा हो सकती है और इससे ‘एक और पाकिस्तान बन सकता है।’ यानी भाजपा इसे किसी रूप में पेश करेगी, ये स्पष्ट है। इसके बावजूद केसीआर सरकार ने वोट बैंक के लिए ये दांव खेला, तो उसका यही मतलब समझा जाएगा कि विकास एवं जन-कल्याणकारी कार्यक्रमों के मोर्चों पर दिखाने के लिए उसके पास कुछ नहीं है।






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