हरियाणा मेल ब्यूरो
20/04/2017  :  10:02 HH:MM
बड़ा इरादा, कठिन राह
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दवा कंपनियों और डॉक्टरों की मिलीभगत को तोडऩे का इरादा जताया है। जाहिर है, इसका चौतरफा स्वागत किया जाएगा। उनकी इस घोषणा से राहत महसूस की जाएगी कि सरकार ऐसा कानून बनाएगी, ताकि डॉक्टर नुस्खा लिखते वक्त ब्रांडेड के बजाय जेनरिक दवाएं लिखें। प्रधानमंत्री ने कहा- ‘डॉक्टर इस तरह से पर्चे पर लिखते हैं कि गरीब लोग उनकी लिखावट को नहीं समझ पाते और लोगों को निजी स्टोर से अधिक कीमत पर दवाएं खरीदनी पड़ती हैं।’ उन्होंने आगे कहा- ‘हम एक ऐसा कानूनी ढांचा लाएंगे जिसके तहत डॉक्टरों को पर्चा ऐसे लिखना होगा जिससे मरीज जेनेरिक दवाएं खरीद सकें और उसे कोई अन्य दवा नहीं खरीदनी पड़े।’
कहा जा सकता है कि एनडीए सरकार इस घोषणा को अमल में ला पाई, तो भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव आएगा। इससे गरीब-पक्षीय होने के उसके दावे को मजबूत आधार मिलेगा। लेकिन इस घोषणा पर अमल कराना आसान नहीं है। कारण देश की संपूर्ण चिकित्सा व्यवस्था में निजी क्षेत्र की बड़ी भूमिका है। यह तथ्य बार-बार दोहराया जाता है कि देश में तीन चौथाई चिकित्सा खर्च लोगों अपने पॉकेट से होता है। ये बात सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की अपर्याप्ता को जाहिर करती है। लेकिन समस्या की शुरुआत यहां से नहीं होती। बल्कि आरंभ मेडिकल की पढ़ाई-लिखाई से होता है, जिसका बड़ा हिस्सा अब निजी क्षेत्र में है। आज डॉक्टरी की पढ़ाई में लाखों, बल्कि करोड़ों रुपए खर्च होते हैं। ऐसे डॉक्टर जब पेशे में आते हैं, तो पैसा कमाने के अलावा उनका कोई मकसद नहीं होता। फिर प्राइवेट अस्पतालों का ऐसा जाल फैला है, जो अधिकतम मुनाफे के सिद्धांत से चल रहा है। उनके विनियमन और निगरानी की व्यव- स्थाएं नाकाफी और भ्रष्टाचार से ग्रस्त हैं। दवा कंपनियों के प्रतिनिधि डॉक्टरों और प्राइवेट अस्पतालों- दोनों को उपहार, विदेश यात्राएं आदि के रूप में रिश्वत देते है, जिसके बदले उनकी उत्पाद दवाओं को डॉक्टर लिखते हैं। इन कंपनियों की मिलीभगत दवा दुकानों से भी होती है। दुकानदार उन दवाओं को बेचने से इनकार करते हैं, जिनमें उन्हें कम कमीशन मिलता हो। इसी मकडज़ाल का परिणाम है कि सस्ती दवाओं और इलाज के मौजूद होने के बावजूद मरीजों को महंगे विकल्पों की तरफ धकेला जाता है। सिर्फ एक कानून या अच्छे इरादों के इजहार से उन्हें इस समस्या से उन्हें राहत नहीं मिल सकती। इसके लिए स्वास्थ्य व्यवस्था में आमूल परिवर्तन लाना होगा। क्या सरकार इसके लिए तैयार है?





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