healthprose viagra http://tramadoltobuy.com/ http://buypropeciaonlinecheap.com/
 
 
हरियाणा मेल ब्यूरो
21/04/2017  :  10:04 HH:MM
इन्हे भारत की नहीं अपनी फिक्र है
Total View  22

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री मैलकम टर्नबुल पिछले हफ्ते भारत आए, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी खूब दोस्ती छलकी। दोनों ने साथ-साथ नई दिल्ली में मेट्रो ट्रेन में यात्रा की, अक्षरधाम मंदिर देखा और सेल्फी ली। लेकिन अपने देश लौटते ही भारत के प्रति टर्नबुल का ये प्रेम काफूर हो गया। मंगलवार को उन्होंने 95,000 से अधिक विदेशी कर्मचारियों द्वारा उपयोग किए जा रहे वीजा कार्यक्रम को खत्म कर दिया। इन विदेशी कर्मचारियों में ज्यादातर भारतीय हैं। इस वीजा कार्यक्रम को 457-वीजा के नाम से जाना जाता है।

इसके तहत कंपनियों को उन क्षेत्रों में चार साल तक विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने की अनुमति थी, जहां कुशल ऑस्ट्रेलियाई कामगारों की कमी है। जाहिर है, टर्नबुल सरकार के फैसले का भारतीय तकनीक-कर्मियों पर बुरा असर पड़ेगा। अभी भारत में इसके परिणामों का अंदाजा लगाया ही जा रहा था कि अमेरिका से भी बुरी खबर आई। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने उस आदेश पर दस्तख़त कर दिए, जिसके तहत एच1-बी वीज़ा कार्यक्रम की समीक्षा की जाएगी। इस कदम को इस वीज़ा कार्यक्रम पर लगाम कसने की शुरुआत समझा जा रहा है। ट्रंप प्रशासन ने कहा कि ये कदम राष्ट्रपति के ‘बाय अमेरिकन, हायर अमेरिकन’ (अमेरिकी उत्पाद खरीदो, अमेरिकियों को नौकरी पर रखो) अभियान के अनुरूप है। ताजा आदेश पर दस्तखत करने के बाद ट्रंप ने कहा- "हमारी आव्रजन प्रणाली में गड़बड़ी के कारण अमेरिकियों की नौकरियां विदेशी कामगार हथिया रहे हैं। ये सब अब ख़त्म होगा।" ट्रंप ने अपने चुनाव अभियान के दौरान जब ‘आई लव हिंदू’
कहा था, तो उससे भारत में खुशी मनाई गई थी। लेकिन उनके ताजा कदम का सबसे बुरा असर भारतीय तकनीक कंपनियों पर ही पड़ेगा। संदेश साफ है। आर्थिक संकट से जूझते देश मौजूदा समय में अंतर्मुखी हो रहे हैं। ट्रंप ने ‘अमेरिका फ़र्स्ट’ का नारा उछाला, तो टर्नबुल भी अपने यहां ‘ऑस्ट्रेलिया फ़र्स्ट’ की बात करने लगे हैं। वैसे ‘इंडिया फ़र्स्ट’ नारा नरेंद्र मोदी भी उछाल चुके हैं। ये प्रवृत्तियां दुनिया के अधिकांश देशों में देखने को मिल रही हैं। भारत जैसे देश, जिसकी अर्थव्यवस्था में प्रशिक्षित मानव संसाधन निर्यात की खास भूमिका रही है, इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। यह भी साफ है कि सामरिक संबंध बढ़ाने या  भावनात्मक बातें करने का विभिन्न देशों के ठोस आर्थिक निर्णयों पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। तो रास्ता क्या है? स्पष्टत: निगाहें घरेलू बाजार पर केंद्रित करनी होंगी। लेकिन यह परिवर्तन एक लंबा रास्ता है।






Enter the following fields. All fields are mandatory:-
Name :  
  
Email :  
  
Comments  
  
Security Key :  
   3708802
 
     
Related Links :-
चुनाव खर्च का पेचीदा मामला
चुनाव आयोग की चुनौतीसशर्त या बिना-शर्त?
जाधव को जस्टिस
बेटियों को सत्याग्रह न करना पड़े सरकार
परमाणु महत्त्वाकांक्षा बनाम यथार्थ
समर्थन की रस्म-अदायगी
सरकार का सही रुख
साइबर अपराधियों का हमला
लेकिन जवाब क्या है?
फांसी पर अंतरराष्ट्रीय फरमान