समाचार ब्यूरो
28/04/2017  :  09:15 HH:MM
लेट-लतीफी की इंतहा
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यह शायद पहला मौका है कि सुप्रीम कोर्ट ने किसी व्यक्ति को भावी जमानत दी हो। यानी छह महीने बाद की तारीख तय करते हुए कहा कि उस रोज तक निचली अदालत में मामले का फैसला नहीं हुआ, तो अभियुक्त को जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा।
यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था में लेट-लतीफी की एक और मिसाल है। उससे नागरिकों के अधिकारों के होने वाले हनन का भी यह उदाहरण है। ऐसे मामलों पर देश की सर्वोच्च अदालत भी खुद को कितना असहाय महसूस करती है, इससे यह भी जाहिर हुआ है। मामला गुलजार अहमद वानी का है। उसे वर्ष 2000 में हुए एक विस्फोट की योजना बनाने के आरोप में 2001 में गिरफ्तार किया गया था। तब से वह जेल में बंद है। वानी को हिजबुल मुजाहिदीन का कार्यकर्ता बताया गया है। वह अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय का शोध छात्र था। जब उसकी गिरफ्तारी हुई तो वह 28 साल का था। अब उसकी उम्र 44 साल हो चुकी है। प्रधान न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर और न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड के सामने ये मामला आया, तो खंडपीठ ने कहा कि वानी 16 साल से अधिक समय से जेल में है। 11 में से 10 मामलों में उसे बरी किया जा चुका है। लेकिन जो एकमात्र केस बचा है, उसमें इतनी लंबी अवधि में अभियोजन पक्ष के 96 गवाहों में से सिर्फ 20 से ही जिरह हो सकी है। तो न्यायालय ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह सभी जरूरी गवाहों से जिरह 31 अक्तूबर जिरह पूरी कर ले। पीठ ने कहा- ‘31 अक्तूबर 2017 तक यह कवायद पूरी हो या नहीं, लेकिन वानी को निचली अदालत द्वारा निर्धारित शर्तो पर एक नवंबर 2017 से जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा।’ इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने 26 अगस्त 2015 को वानी की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। तब वानी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। गौरतलब है कि 2000 में मुजफ्फरपुर से अहमदाबाद जा रही साबरमती एक्सप्रेस में कानपुर के पास ब्लास्ट हुआ था, जिसमें 10 लोगों की जान गई थी। ऐसी घटनाओं के दोषियों से कोई रहम नहीं हो सकती। लेकिन आखिर न्याय सुनिश्चित करने की कोई समयसीमा तो होनी चाहिए। अभियोजन व्यवस्था ऐसा नहीं कर पाती, तो फिर किसी को विचाराधीन कैदी के रूप में कब तक जेल में रखा जाना चाहिए- यह अहम सवाल है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिला है।






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