हरियाणा मेल ब्यूरो
01/05/2017  :  08:20 HH:MM
शांति से तय होगी बदलाव की राह
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दे श बदल रहा है। मोदी सरकार का ये नारा काफी लुभाने वाला है। बहुत से लोगों को लगता है ये प्रगति की प्रेरणा देने वाला मन्त्र है। इस नारे से लोग उत्साहित होते हैं। उनमे अपने देश के प्रति सकारात्मक भाव आता है। भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए एक लाइन का ये सूत्रवाक्य बिना किसी तर्क के बदलाव की कहानी बयां करता नजर आता है। आना भी चाहिए। मुझे लगता है सकारात्मक ऊर्जा के लिए ऐसे राजनीतिक मंत्र गढ़े जाने में कोई बुराई नहीं है।

इसमें कोई अतिशयोक्ति भी नहीं है। क्योंकि पिछले 70 सालों में देश लगातार बदल रहा है। हमने जल,थल,नभ् हर छेत्र में प्रगति की है। शिक्षा,स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं का विस्तार हुआ है। सडक़ से लेकर रेल,संचार तक विकास हुआ है। आईटी के फील्ड में हम दुनिया में बड़ी ताकत हैं। हमारी सैन्य शक्ति बढ़ी है। ये काल क्रम में लगातार हो रहा है। कई सरकारों का इनमे योगदान है। केवल तीन साल में हम अंतरिक्ष की बड़ी ताकत नहीं बन सकते थे। लेकिन इन तीन साल का भी योगदान है। इसमें कोई शक नहीं।

लेकिन। लेकिन क्या? ये लेकिन ही हमें परेशान करता है। दरअसल देश काफी कुछ बदल रहा है लेकिन जो नहीं बदल रहा है वो है कश्मीर की स्थिति और नक्सलबाड़ी की समस्या। पूर्वोत्तर में भी समय समय पर उठने वाली आग बताती है कि समस्या वहां भी बनी हुई है। इसलिए जब हम कहते हैं कि देश बदल रहा है तो ये समग्रता में नहीं होता। क्योंकि सतत विकास के क्रम में देश के कुछ अंचलों की अशांति लगातार बाधा का काम कर रही है। और जो भी नेतृत्व इन इलाकों में शांति के लिए गंभीर प्रयास करेगा उसे ही गर्व से कहने का हक़ मिलेगा देश बदल गया है। इसलिए देश बदल रहा है से आगे निकालकर देश बदल गया है क़ी दिशा ही सरकार की मजबूती का एहसास भी कराएगी। लोगों को उम्मीद थी कि प्रचंड बहुमत वाली मोदी सरकार ऐसा कर सकती है। लेकिन दुर्भाग्य से सरकार इस समय या तो असहाय नजर आ रही है। या फिर सरकार को दिशा भ्रम है। हमें अपनी दिशा तय करनी होगी। सरकार को बताना होगा कि उसका एक्शन ह्रश्वलान क्या है। हमने कहा है कि हम जम्मू कश्मीर में पत्थर फेंकने वालों से बात नहीं कर सकते। अगर ऐसा है तो हम उन बच्चों को कैसे समझायेंगे जिन्होंने खेलने खाने और पढाई की उम्र में हाथ में पत्थर लेकर सुरक्षाबलों पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। निश्चित रूप से ये गुमराह बच्चे हैं। इन्हें समझाना होगा। क्योंकि इस उम्र में दिमाग में अगर देश के खिलाफ यहाँ के सिस्टम के खिलाफ मन में कुछ बातें घर कर गई। सिस्टम और आम लोग एक दूसरे के दुश्मन बन गए तो बात हाथ से निकल जायेगी। हमें दो तरफ़ा रणनीति अपनानी होगी। अपनों को समझाना होगा। बात करनी होगी। सीमापार से यहाँ दहशत फैलाने आये आतंकियों और इनको पनाह देने वालों को ढेर करना होगा। सरकार को इंतजार नहीं करना चाहिए कि कोई आकर उनका दरवाजा खटखटाये। लोग आकर गिडग़ड़ायें। बल्कि खुद आमन्त्रण देकर बातचीत की पहल करनी होगी। नक्सल प्रभावित इलाकों में सामान्य जन सरकार के खिलाफ पत्थर लेकर नहीं खड़ा है। उन्हें विकास के जरिये मुख्यधारा से जोडऩे की सराहनीय कोशिश अनवरत चल रही है। लेकिन सुरक्षा बलों को जंगल में छिपे हथियारबंद उग्रवादियों से उसी तरह से निपटना चाहिए जैसे कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ कोशिश हो रही है। दुर्भाग्य से सीआरपीएफ के जवानो को वो तकनीक, उपकरण, वाहन और सुविधाएं नहीं उपलब्ध हैं जो सेना को मिलती है। इसी वजह से सुरक्षबलों को गंभीर नुकसान झेलना पड़ रहा है। सुकमा अभी भी सबसे विकट परिस्थितियों से जूझ रहा इलाका है। सुकमा के शहीदों सहित तमाम दिवंगत जवानों को सही मायने में सरकार की यही श्रद्धांजलि होगी कि वे उनकी जरूरतों को पूरा करें। उम्मीद है देश बदलेगा। लेकिन उससे पहले देश के अशांत अंचलों का सम्भलना जरुरी है। मोदी सरकार की सफलता का यही पैमाना होगा। ख़ुशी होगी जब ये नारा गूंजे कि कश्मीर संभल रहा है। सुकमा संवर रहा है। -जय हिन्द





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