समाचार ब्यूरो
02/05/2017  :  09:58 HH:MM
कृषि आय पर टैक्स लगे?
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क्या खेती से होने वाली आमदनी पर आयकर लगना चाहिए? ये बहस फिर उठी है। शुरुआत नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय के बयान से हुई।

उन्होंने कहा कि सरकार को अपने संसाधन बढ़ाने के लिए कृषि आय को टैक्स के दायरे में लाना चाहिए। इस पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सफाई दी कि सरकार का ऐसा करने का कोई प्रस्ताव नहीं है। लेकिन उसके बाद आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद नीति पनगढिय़ा का बयान आ गया। उन्होंने कहा कि संविधान के तहत केंद्र के लिए ऐसा करना संभव नहीं है। लेकिन देश के 29 राज्यों के पास कृषि आय पर कर लगाने का विकल्प खुला हुआ है। दरअसल, बात सिर्फ इन बयानों तक सीमित नहीं है। हाल में जारी नीति आयोग के विजन डॉक्यूमेंट में एक पैराग्राफ ‘इनकम टैक्स ऑन ऐग्रिकल्चर इनकम’ पर भी लिखा गया है। इसमें कहा गया है- ‘अभी खेती से हुई हर आय को इनकम टैक्स से छूट मिली हुई है, भले ही यह आय कितनी भी ज्यादा, या कम हो।

खेती से आय को टैक्स मुक्त रखने का मकसद किसानों को संरक्षण प्रदान करना था। लेकिन, कभी-कभार इसका इस्तेमाल खेती से इतर हुई आय पर भी कर छूट पाने के लिए किया जाता है। काला धन पैदा होने की समस्या से निपटने के लिए ऐसे चोर दरवाजों को बंद करना होगा।’ तो क्या सरकार की भीतरी मंशा 
कृषि आय पर कर लगाने की है? और क्या ये काम राज्यों के माध्यम से करने को सोचा जा रहा है? यहां यह ध्यान रखना चाहिए कि कृषि राज्य सूची का विषय है और इस पर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग दरों से लगान या मालगुजारी लगाने का प्रावधान है। लेकिन यहां बात आयकर की हो रही है। लेकिन वर्तमान वैधानिक प्रावधानों के तहत आयकर लगाना या उसकी दरें तय करना केंद्र के अधिकार क्षेत्र में आता है। तो फिर ये बात किस तर्क से राज्यों पर छोडऩे की बात कही जा रही है? कृषि पैदावार के जिस स्तर पर परोक्ष कर लगते हैं (मसलन, रेस्तरां में भोजन), जीएसटी लागू होने के बाद वे नई अखिल भारतीय व्यवस्था के तहत आ जाएंगे। यानी यह भी राज्यों के दायरे में नहीं रहेगा। तो केंद्रीय पदाधिकारी किस तर्क और समझ से बात कर रहे हैं? इन सवालों पर उन्हें स्पष्टीकरण देना चाहिए। वरना, यही माना जाएगा कि बिना होमवर्क किए वे वे-बजह की चर्चा में देश को उलझा रहे हैं।






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