हरियाणा मेल ब्यूरो
04/05/2017  :  18:13 HH:MM
पाकिस्तान के आगे लाचार?
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पाकिस्तान ने फिर बर्बरता दिखाई। जम्मू-कश्मीर में पुंछ स्थित कृष्णा घाटी में उसके सैनिक भारतीय सीमा के अंदर आए और हमारे दो जवानों को मार डाला। इतना ही नहीं, शहीद जवानों के शवों को क्षत-विक्षत भी किया। इस खबर से देश में आक्रोश फैलना वाजिब है। तो शायद इसी के मद्देनजर यह खबर आई कि सरकार ने सेना को जवाबी कार्रवाई करने की पूरी छूट दे दी है।

उसके बाद भारतीय सैनिकों के हमले में सात पाकिस्तानी फौजियों के मरने का समाचार आया। लेकिन क्या ऐसी कार्रवाइयां पर्याप्त हैं? क्या इनसे आगे दुस्साहस करने से पाकिस्तान बाज आएगा? सीधा जवाब है- ना। हालिया घटनाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि पिछले साल उड़ी हमले के बाद हुई सर्जिकल स्ट्राइक अपना मकसद पाने में नाकाम रही। साथ ही ये धारणा भी निराधार साबित हुई कि नोटबंदी से आतंकवादियों/ नक्सलवादियों की कमर टूट गई है। जाहिर है, ऐसे दिलासों से देश को अब तसल्ली नहीं होगी। लोगों अपेक्षा है कि सरकार संयम-भरे, लेकिन दीर्घकालिक और गहरा प्रभाव छोडऩे वाले कदम उठाए।

ऐसे तीन कदम हो सकते हैं- पहला यह कि सरकार बिना दूसरे देशों का इंतजार किए खुद पाकिस्तान को "आतंकवादी देश" घोषित करे। इसके तहत जो भी जरूरी कदम हों, वे उठाए जाएं। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस एलान को कार्यरूप दिया जाए कि खून और पानी साथ-साथ नहीं बह सकते। मतलब कि सिंधु जल समझौते को स्थगित किया जाए। फिर बलूचिस्तान के मामले को विदेश नीति के एक सुसंगत पहलू के रूप में उठाया जाए। पिछले साल इसका जिक्र करने के बाद इस दिशा में कोई ऐसा ठोस कदम नहीं उठा, जिससे पाकिस्तान को वाजिब पैगाम मिलता। ठोस कदमों से पाकिस्तान की हरकतों पर नीतिगत ढंग से काबू पाने का भारत का इरादा जाहिर होगा। क्षणिक कार्रवाइयां प्रतिशोध की जन-भावना पर मरहम लगाती हैं, लेकिन उनसे किसी समाधान की उम्मीद नहीं की जा सकती। सवाल है कि पाकिस्तान को यह संदेश देने के लिए क्या किया गया है कि उसके दुस्साहस महंगे पड़ेंगे? जब तक ऐसा नहीं होता, दशकों से भारतीय भूमि पर  जारी खून-खराबा चलता रहेगा। सर्जिकल स्ट्राइक कारगर कार्रवाई हो सकती थी, अगर उसमें किसी बड़े आतंकवादी का सफाया हुआ होता। मगर वह सीमाई इलाकों में एक हमला तक था, जिसकी परवाह आतंक को राजकीय नीति के रूप अपनाने वाला पाकिस्तान नहीं करता। तो अब वही करना होगा, जिससे उसकी चिंताएं बढ़े। क्या एनडीए सरकार इसके लिए तैयार है?





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