हरियाणा मेल ब्यूरो
07/05/2017  :  11:40 HH:MM
सवाल राजनीतिक इच्छाशक्ति का
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केंद्र सार्वजनिक बैंकों में एनपीए की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए बैंकिंग नियमन कानून में संशोधन करेगा। पहले इसके लिए अध्यादेश लाया जाएगा। अध्यादेश को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूरी दे दी है।

 इसमें क्या प्रावधान हैं, इसका ब्योरा अभी सामने नहीं आया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि परंपरा है कि जब किसी प्रस्ताव को राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है, तो उसके ब्योरे का खुलासा उस पर मंजूरी से पहले नहीं किया जाता। उन्होंने कहा कि जैसे ही राष्ट्रपति की मंजूरी मिलेगी, इसका विवरण साझा किया जाएगा। गौरतलब है कि भारतीय बैंकिंग व्यवस्था के छह लाख करोड़ रुपए के डूबने के कगार पर हैं। सरकारी सूत्रों के मुताबिक प्रस्तावित कानून का ढांचा भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम और बैंकिंग नियमन अधिनियम की परिकल्पना के मुताबिक है।

नए प्रावधानों से बैंकों को कारोबारी नजरिए से व्यावहारिक फैसले लेने की अनुमति मिल सकेगी। साथ ही जांच एजेंसियां ऐसे मामलों की जांच नहीं कर सकेंगी। इसके अलावा डूबते कर्ज से निपटने के क्रम में भारतीय रिजर्व बैंक को सरकारी बैंकों की ओर से हस्तक्षेप करने का अधिकार मिलेगा। नए ढांचे में रिजर्व बैंक की निगरानी में कई निरीक्षण समितियों का गठन हो सकेगा, जो मूल्य के आधार पर 35-40 प्रमुख एनपीए (डूबते कर्ज) मामलों में प्रगति की निगरानी करेंगी। इन मामलों की कुल एनपीए में हिस्सेदारी 60 प्रतिशत से ज्यादा है। सार्वजनिक क्षेत्रों का फंसा कर्ज वित्त वर्ष 2016-17 की अप्रैल-दिसंबर अवधि एक लाख करोड़ रुपए से अधिक बढक़र 6.06 लाख करोड़ रुपए हो गया। वित्त वर्ष 2015-16 के अंत तक यह 5,02,068 करोड़ रुपए था। वैसे कुल अनुमान है कि सरकारी बैंकों के करीब साढ़े नौ लाख करोड़ रुपए फंसे हुए हैँ। क्या नया कानून अमल में आने के बाद सरकारी बैंक इस रकम को वसूल पाएंगे? यह पेचीदा सवाल है। कर्ज बड़ी कंपनियों के मालिकों ने लिया है। अपने खिलाफ कार्रवाई को कानूनी उलझनों में फंसाने की चालें वे खूब जानते हैं। इसके अलावा एक बड़ी समस्या राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव की है। सुप्रीम कोर्ट में सरकार लगातार उन लोगों के नाम बताने से इनकार कर रही है, जिन पर बड़ी मात्रा में कर्ज बकाया है। सरकार के इस रुख पर सुप्रीम कोर्ट भी अप्रसन्नता जता चुका है। अक्सर देखा गया है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति ना हो, तो कानूनी प्रावधान अपना मकसद पाने में सफल नहीं होते। इसीलिए एनपीए के मामले में ताजा कदम भले आशाजनक हो, लेकिन आशंकाएं भी कायम हैं।





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