हरियाणा मेल ब्यूरो
08/05/2017  :  09:30 HH:MM
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध...
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दि ल्ली की राजनीति में बहुत ही दुखद प्रसंग सामने आया है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की उपज मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर भ्रष्टाचार का आरोप उनके ही द्वारा नियुक्त एक मंत्री लगाया है। कपिल मिश्रा जिन्हें केजरीवाल ने मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया, उनका आरोप है कि केजरीवाल ने दो करोड़ उनकी आंख के सामने लिए हैं।

पैसा देने वाले  वही सत्येंद्र जैन हैं जिनपर कई गड़बडिय़ों के आरोप पहले लगे हैं। लेकिन केजरीवाल ने उन्हें क्लीन चिट दी है। कपिल मिश्र खुद को आई विटनेस यानी चश्मदीद गवाह बता रहे हैं। उनका कहना है कि वे इसकी गवाही एंटी करह्रश्वशन ब्यूरो और सीबीआई के सामने देंगे। अगर कपिल की बात में तनिक भी सचाई है तो ये भारतीय लोकतंत्र के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण दिन है। हालांकि इस आशंका में मेरा तनिक भी भरोसा नहीं है। केजरीवाल सरकार के जितने भी मंत्री और नेता हैं उनमे अगर किसी पर ईमानदारी को लेकर शत प्रतिशत दांव लगाया जा सकता है तो वे सिर्फ और सिर्फ केजरीवाल हैं। उनपर खऱाब राजनीति का आरोप लगाया जा सकता है। उनपर ये भी आरोप लगाया जा सकता है कि उन्हें राजनीति का ककहरा नहीं पता इसलिए वे शासन प्रशासन चलाने में बड़ी चूक कर रहे हैं। उनके बारे में ये भी कहा जा सकता है कि वे राजनीतिक शिष्टाचार का पालन करने में विफल रहे हैं इसकी वजह से राजनीतिक दलों में उनके दोस्त कम दुश्मन ज्यादा हैं। 

खुद पर जरूरत से ज्यादा भरोसा और दूसरों पर एतबार न करना भी उनका स्वभाव हो सकता है। लेकिन ये स्वीकार करना बेहद कठिन या लगभग असंभव जैसा है कि केजरीवाल ने कोई रिश्वत ली। या कुछ गलत करने या होने देने के लिए पैसे लिए। लेकिन मेरा भरोसा या ऐसे ही लाखों लोगों का उनपर भरोसा पर्याप्त नहीं है। केजरीवाल को साबित करना होगा कि उनपर आरोप लगाने वाले गलत हैं। आरोप लगाने वाले घटिया या छिछोरी राजनीति कर रहे हैं। कोई और इसे साबित नहीं कर सकता। इसलिए बेहतर होगा कि बिना ज्यादा समय गंवाए खुद केजरीवाल इसकी घोषणा कर दें कि वे जांच एजेंसियों को आमंत्रण देते हैं कि इन सभी आरोपों
की समयबद्ध तरीके से जांच की जाए। अब आम आदमी पार्टी की पीएसी या पार्टी की कोई समिति इसकी जांच नहीं कर सकती। खुद किसी के सर्टिफिकेट देने का मसला नही है। केजरीवाल जिस तरह की राजनीति करते रहे हैं उसमें भरोसा सबसे महत्वपूर्ण है। ये भरोसा खुद उन्हें कायम करना होगा। हमें उम्मीद है वे ऐसा ही करेंगे। क्योंकि किसी दल या राजनीति के फेर में पड़े बिना मुझ जैसे बहुत से लोग ये चाहते हैं कि जिसे ईमानदारी की वजह से लोगों ने सर आंखों पर बैठाया,उसपर शासन में विफल रहने का आरोप भले ही लगे बेईमानी का आरोप नहीं लगना चाहिए। अगर इस तरह के आरोप सच साबित हुए तो लोगों के भरोसे को बड़ा धक्का लगेगा। लेकिन यहां कुछ बातें और भी हैं जिनका जिक्र करना जरुरी है। आम आदमी पार्टी में इस समय बहुत कुछ घट रहा है। बीते दिनों विश्वास का विरोध सामने आया। उन्होंने खुलकर केजरीवाल पर निशाना साधा। स्वाभाव के विपरीत केजरीवाल न सिर्फ झुके बल्कि उन्हें मनाने के लिए उन्होंने समझौते किये। विश्वास ने पार्टी की गलतियों का मसला उठाया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि पार्टी अपने सिद्धान्तों से भटक गई है। पंजाब और दिल्ली एमसीडी चुनाव में टिकट बांटने में हेराफेरी के आरोप उन्होंने लगाये। पार्टी के विधायक अमनुतल्लाह खा ने विश्वास के भाजपा से मिले होने का आरोप लगाया। दबाव में अमनुतल्लाह पार्टी से निलंबित हो गए। लेकिन ये घटनाक्रम बताने के लिए पर्याप्त है कि पार्टी में सबकुछ ठीक नहीं है। ऐसा पहले भी हुआ था। दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत के बाद। जब प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव को पार्टी से बाहर होना पड़ा था। केजरीवाल ने इन दोनों पर बेहद तल्ख़ भाषा में आरोप लगाते हुए कहा था कि ये पार्टी को दिल्ली में हराने के अभियान में जुटे थे। उस वक्त भी बहुत से लोगों को ये रास नहीं आया था। खुद पार्टी के शुभचिंतक निराश थे। कहा जा रहा था कि केजरीवाल प्रचंड जीत के बाद पूरे मामले को ज्यादा बेहतर तरीके से निपटा सकते थे। लेकिन ऐसा नही हुआ। खैर ताजा विवाद ज्यादा गंभीर है। इसके और भी गंभीर होने के आसार हैं। क्योंकि चक्र केजरीवाल के पक्ष में नहीं है। वे पंजाब का चुनाव हारे हैं। दिल्ली एमसीडी चुनाव में उन्हें शिकस्त मिली है। पंजाब में प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उनकी मौजूदगी उनकी अपनी ही विराट उम्मीदों के आगे दब गई। अगर वे उम्मीदों का पहाड़ नहीं खड़ा करते तो वे इस बात का जश्न मना सकते थे कि उन्होंने पंजाब में जबरदस्त मौजूदगी दर्ज कराई।

शायद राजनीति का नौसिखियापन ही है जिसकी वजह से एक के बाद एक गलतियां करके केजरीवाल अपने दुश्मनों को बढ़ाते जा रहे हैं। या फिर टीम केजरीवाल को ये लगने लगा है कि राजनीति की नई परिभाषाएं वही गढ़ सकते हैं। दिल्ली की जीत जिस गैर परम्परागत अंदाज पर फि़दा होकर लोगों ने उन्हें सौंपी थी वो आगे भी चलेगा ये सोच ठीक नहीं। भाजपा और केंद्र में बैठी सरकार से उनका छत्तीस का आंकड़ा जग जाहिर है। कोई अचरज नहीं आने वाले दिनों में आप के कुछ लोग वहीं खड़े नजर आएं। बहुत से लोग ताजा उठापटक में भी भाजपा की भूमिका देख या पढ़ रहे हैं। खैर जो भी हो आपको अपनी गलतिया ंसमझनी होंगी। ये मानना होगा सत्ता में आने के बाद आपको बहाने नहीं परफॉर्मेन्स दिखाना होता है। मिलजुलकर काम करना होता है। खुद का प्रस्तुतीकरण बेहतर तरीके से करना होता है। और लोगों की धारणा सही बनी रहे ये प्रयास भी करना होता है। इसे सही आचरण और सही नेतृत्व से ही हासिल किया जा सकता है। केवल ईमानदारी का अभिमान ही शासन की पहचान नहीं हो सकता। शासन कई गुणों के मिश्रण का नाम है। जब आप उस मिश्रण से दूर रहते हैं तो आपकी यूएसपी को भी लोग नकारात्मक बना देते हैं। केजरीवाल के साथ यही हो रहा है उनकी पहचान पर हमला हुआ है। भ्रष्टाचार विरोधी आइकॉन खुद भ्रष्ट आचरण के आरोपों से घिरा है। कितना कष्टदायी होगा उनके लिए ये अनुमान लगाया जा सकता है। उनसे ज्यादा दुखद उन लोगों के लिए है जिन्होंने पूरे आंदोलन से प्रेरित होकर भ्रष्टाचार के खिलाफ झंडा थामा था। आरोप सच थे या झूठे मनमोहन के प्रधानमंत्री रहते भी साबित नहीं हो पाया था। लेकिन धारणा ने उनका ही नहीं कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया। पार्टी आज भी उससे नहीं उबर पाई है। आम आदमी पार्टी और खुद केजरीवाल ने राजनीति के जो प्रतिमान या आदर्श गढ़े थे आज उनका सामना उनसे ही हो रहा है। बड़ी परीक्षा है। केजरीवाल इस परीक्षा में हारे तो देश में करोङो लोग निराश होंगे। छद्म राजनीति के फिर से हावी होने का अंदेशा होगा। दिल्ली के मुख्यमंत्री नहीं अन्ना के आंदोलन से उपजे नायक से जवाब का इन्तजार रहेगा। केजरीवाल को ये पंक्तियां भी याद रखनी होंगी। समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध। जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध। ...जय हिंद





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