हरियाणा मेल ब्यूरो
10/05/2017  :  09:41 HH:MM
अपने ही जाल में केजरीवाल
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अरविंद केजरीवाल पर उनकी ही सरकार में मंत्री रहे कपिल मिश्र ने एक अन्य मंत्री सत्येंद्र जैन से दो करोड़ रुपए लेने का आरोप लगाया। केजरीवाल के पूर्व सहयोगियों- आम आदमी पार्टी (‘आप’) से निष्कासित योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने कहा है कि उन्हें इस इल्जाम पर भरोसा नहीं है। यही बात पार्टी के असंतुष्ट नेता कुमार विश्वास ने भी कही है, जबकि कपिल मिश्र को उनका ही करीबी माना जाता है।

इन सबका कहना है कि ये बात वे तभी मान सकते हैं जब ठोस सबूत पेश किए जाएं। मगर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस केजरीवाल के प्रति ऐसी उदारता दिखाने के मूड में नहीं हैं। उन्होंने "भ्रष्ट" केजरीवाल को सत्ता से हटाने की मुहिम छेड़ दी है। मीडिया की चर्चाओं में भी केजरीवाल को संदेह का लाभ देने का नजरिया नहीं दिखता। बेशक इन प्रतिक्रियाओं को केजरीवाल अपने प्रति नाइंसाफी बताएंगे। लेकिन तथ्य यह है कि बिना सबूत के धुआंधार आरोप लगाने की सियासत शुरू करने का श्रेय खुद उनको ही जाता है। इसे विडंबना (या अंग्रेजी के मुहावरे में पोएटिक जस्टिस) ही कहेंगे कि जिस टैंकर घोटाले को उछाल कर केजरीवाल
ने शीला दीक्षित को जनता की नजऱों से गिराया, आज उसी घोटाले के छींटे खुद उनके दामन पर डाले गए हैं।

कपिल मिश्र ने दावा किया है कि टैंकर घोटाले की फाइल दो साल पहले ही ‘आप’ सरकार को सौंप दी गई थी, लेकिन उस पर कार्रवाई नहीं की गई। केजरीवाल के समर्थक कपिल मिश्रा या कुमार विश्वास के पीछे भाजपा का हाथ होने का संकेत देते हैं। मुमकिन है इस बात में दम हो। लेकिन असल मुद्दा यह नहीं है। असली
सवाल है कि केजरीवाल के अपने लोग क्यों इस हद तक उनके खिलाफ जा रहे हैं? क्या इससे यह संकेत नहीं मिलता कि ये लोग सफलता और सत्ता के साथी थे? ऐसा मानने वाले लोगों की कमी नहीं कि केजरीवाल के साथ ऐसे ही लोगों का जमावड़ा हुआ। उन्होंने भ्रष्टाचार को भावनात्मक मुद्दा बनाकर उसे हवा दी। तत्कालीन सत्ताधारी कांग्रेस को घेरा। यह सत्ता हासिल करने की योजना का हिस्सा था। इसमें वे शक्तियां सहायक बनीं, जिनका मकसद उस समय केजरीवाल के उद्देश्य से मेल खाता था। फ़ौरी मुकाम पाने के बाद उनके रास्ते अलग हो गए। वही शक्तियां अब केजरीवाल को नष्ट करने में लगी हैं। इससे केजरीवाल मुसीबत में हैं। लेकिन
उपरोक्त बातें सही हैं, तो आखिर उनसे किसे हमदर्दी होगी! 





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