समाचार ब्यूरो
14/05/2017  :  10:39 HH:MM
तलाक तलाक पर ‘सुप्रीम’ बहस
Total View  342

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड मुसलमानों की प्रतिनिधि संस्था नहीं है या तीन तलाक सरीखे मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सामने बहस शुरू हो सकी है,तो उसका बुनियादी श्रेय प्रधानमंत्री मोदी को जाना चाहिए। अलबत्ता जब से देश आजाद हुआ है, उससे पहले से ही यह कुप्रथा जारी रही है। चूंकि कांग्रेस समेत ज्यादातर दल इसे ‘मजहबी मामला’ मानते हुए दखलंदाजी नहीं करना चाहते थे,लिहाजा मुस्लिम औरतों पर ज़ुल्म और अत्याचार के सिलसिले जारी रहे।

प्रधानमंत्री मोदी के कुछ आह्वानों ने तीन तलाक से पीडि़त महिलाओं को लामबंद होने का मौका मुहैया कराया और उन औरतों ने सर्वोच्च अदालत की चौखट खटखटाई। बेशक प्रधानमंत्री की इन कोशिशों में सियासत निहित थी, लेकिन उनका मकसद सामाजिक और राष्ट्रीय था। वह तीन तलाक जैसी कुरीति को जड़ से खत्म करने पर आमादा थे, लिहाजा हलफनामे के जरिए केंद्र सरकार का रुख भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। इस मामले में सियासत कोई पाप नहीं है, क्योंकि यह इनसानियत का तकाजा था। बेशक प्रधानमंत्री मोदी मुस्लिम औरतों की समानता को व्यावहारिक मायनों में तय करना चाहते थे। लिहाजा मोदी सरकार ने संविधान पीठ से यह सवाल भी पूछा है कि समानता के अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और गरिमा से जीने के मौलिक अधिकार में से प्राथमिकता किसे दी जाए? प्रधानमंत्री मोदी की कोशिशों ने तीन तलाक पर सामाजिक कलंक चिपका दिया, उसे सामाजिक कुरीति साबित किया और उसे मुस्लिम औरतों के मानवाधिकारों के सरोकार से जोड़ा। हालांकि मुस्लिम समाज का एक तबका, मौलाना और मुफ्ती आज भी दोगली जुबान बोल रहे हैं। एक तरफ वे बयान देते हैं कि तीन तलाक के दोषियों को कड़ी सजा दी जाए, कोड़े मारे जाएं या फांसीसूली पर लटका दिया जाए, लेकिन अब भी वे मुस्लिम कठमुल्ले सरकार और अदालत का दखल नहीं चाहते।

कुरान और इस्लाम में तलाक की क्या प्रक्रिया है, उसकी व्याख्या मैं नहीं कर सकता, लेकिन इतना एहसास है कि तीन तलाक ने कुरान और इस्लाम को अपमानित किया है। जो इस्लाम और शरियत में हराम है, जिस जमीन पर तलाक होता है, वह भी हराम और दोजख समान है, तो आज तक मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन तलाक की समीक्षा तक क्यों नहीं की? आज पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कुछ सवाल जरूर उठाए हैं। यह पीठ भी अद्भुत है, जिसमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और पारसी न्यायाधीश हैं। यानी पूरी तरह धर्मनिरपेक्षज्! न्यायिक पीठ जानना चाहती है कि क्या तीन तलाक इस्लाम धर्म का मूल हिस्सा है या नहीं? क्या तीन तलाक मुस्लिम औरतों के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है? क्या तीन तलाक को भी पवित्र माना जा सकता है? जिन देशों में तीन तलाक पर पाबंदी है, क्या वे इस्लामिक देश नहीं हैं? इस्लाम के लिहाज से अच्छे देश नहीं हैं? क्या मुस्लिम पर्सनल लॉ भी शरियत का मामला है? केंद्र सरकार ने भी संविधान पीठ के सामने कुछ सवाल रखे हैं। दरअसल संविधान पीठ तीन तलाक के मुद्दे को संविधान और कानून के संदर्भ में हल करना चाहती है। मुसलमानों के मजहब में जरा-सी भी दखलंदाजी के पक्ष में संविधान पीठ नहीं है। लिहाजा यह ‘सुप्रीम बहस’ लंबी चलेगी और उम्मीद करनी चाहिए कि मुस्लिम औरतों को एक ही बार में तीन तलाक की कुरीति से निजात मिलेगी।






Enter the following fields. All fields are mandatory:-
Name :  
  
Email :  
  
Comments  
  
Security Key :  
   2152288
 
     
Related Links :-
प्रदूषण रोकने, हिंसक प्रदर्शन और पुलिस गोलीबारी का औचित्य
केरल में निपाह का प्रकोप
जैव विविधता भारत की धरोहर है
लोकतंत्र के लिए कड़े फैसले जरूरी
यरुशलम में अमेरिकी दूतावास
अपने शरीफाना बयान पर कितना कायम रहेंगे शरीफ
खुदरा कारोबार को ध्वस्त कर देगा यह सौदा
शांति में ही मिलेगा ईश्वर, अल्लाह और वाहे गुरु
विकासशील देशों पर भी होगा ट्रंप के फैसले का विपरीत असर
प्रदेश पुलिस को बल