हरियाणा मेल ब्यूरो
15/05/2017  :  15:42 HH:MM
उम्मीदों के बोझ में खत्म न हो बचपन
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बच्चों, अभिभावकों और स्वस्थ बालमन के हिमायती पूरे समाज के लिए एक अच्छी खबर। पहले हरियाणा और अब यूपी सरकार ने स्कूलों में शनिवार को नो बैग डे घोषित किया है। हरियाणा सरकार का कदम आंशिक है। अभी सौ स्कूलों के लिए लागू किया गया है। बाकी स्कूलों में इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा। मेरा मानना है ये फैसला ऐसा है जिसे किश्तों में लागू करने की जरूरत नहीं है। आप ओपिनियन पोल करा लीजिये आपको पता चल जाएगा मौजूदा शिक्षा व्यवस्था से लोग किस कदर त्रस्त हैं। स्कूलों की मनमानी सहने को मजबूर। स्कूल किस होड़ में हैं समझना मुश्किल है। केवल कमीशन का चक्कर है या फिर किसी बड़ी साजिश का वे जाने अनजाने शिकार हो रहे हैं।

लेकिन सच यही है कि ज्यादातर स्कूल अपनी जिम्मेदारी निभा पाने में विफल साबित हो रहे हैं। बाल मन बहुत कोमल होता है। इसे मजबूत बनाने की जिम्मेदारी सही मायने में स्कूल और उनके अभिभावकों की होती है। अभिभावक खुद को असहाय पाते हैं जब उन्हें स्कूलों से बोझिल शिक्षा के फार्मूले में भागीदार बनने को कहा जाता है। भारी भरकम बस्ते का बोझ। स्कूल में पढाई का बोझिल तरीका। घर लौटने पर अगले दिन के लिए ढेर सारा होम वर्क। पूरी जिंदगी मानों स्कूल की किताबों, टेक्स्ट बुक और टाइमिंग के फेर में उलझ कर रह जाती है। बच्चों को शुरू से अनुशासन का पाठ पढाया जाना जरूरी है। उन्हें सही और गलत की जानकारी भी दी
जानी चाहिए। संस्कार तो सबसे ज्यादा जरूरी है। पढाई की महत्ता भी उन्हें पता होनी चाहिए। लेकिन सवाल है कि तरीका क्या हो? क्या बच्चे को हंसी ख़ुशी ये सब नहीं बताया जा सकता। क्या उन्हें उनकी सह सकने की छमता के मुताबिक ही डांट मिले ये देखना जरूरी नहीं है। क्या इस बात का आकलन नहीं होना चाहिए कि तीन-चार साल के बच्चे की पढाई की सीमा क्या हो। उन्हें खेलने और अपनी रूचि के मुताबिक मस्ती करने को मिले ये कौन देखेगा? स्कूल की टेक्स्ट बुक से लेकर बस्ते का बोझ,टाइमिंग,और पढ़ाने के तरीके की पूरी समीक्षा होनी चाहिए। हर किसी बच्चे के साथ एक जैसा ट्रीटमेंट, हर किसी को एक ही सांचे में ढालने की कोशिश। पढ़ाने का उबाऊ तरीका। इन सबसे ज्यादा बच्चों पर छमता से ज्यादा बोझ डाल देना अपराध है। कई बच्चे इस बोझ को नहीं सह पाते और वे बचपन से ही अनमने से रहने लगते हैं। दुनिया और आसपास के लोग उन्हें नीरस लगने लगते हैं। जो उन्हें अच्छा लगता है उन्हें करने नहीं मिलता तो जो उनसे करने को कहा जाता है वे करना नहीं चाहते। व्यवहार का ये परिवर्तन कभी कभी गंभीर अवसाद का लक्षण होता है। कई बार ये तुरंत उतना नुकसान दायक नहीं दिखता जितना होता है। लेकिन जब इसका कुफल सामने आता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। बाल मन कुम्हलाने न पाये। उसकी प्राकृतिक कोमलता को क्रूर व्यवस्था खत्म न करे। उसे उसकी छमता के मुताबिक ही भार दिया जाए। पढाई उसे रुचिकर लगे। हंसते खेलते वातावरण में पढ़ाई कराई जाए। किताबी ज्ञान से ज्यादा वातावरण के जरिए व्यवहार ज्ञान से शिक्षा दी जाए। स्कूल का वातावरण खुशनुमा हो। ये सभी चीजें शुरू से देखनी जरूरी है। 

शायद यही बुनियाद एक बेहतर व्यक्तित्व का निर्माण करने में सहायक हो सकती है। ये व्यक्तित्व अपनी छमता और रूचि के मुताबिक किसी भी छत्र में कितनी भी बड़ी ऊंचाई हासिल कर सकता है। ऐसा नहीं है कि पहली बार ये सब बातें हो रही हैं। न जाने कितनी कमेटियां बनी। बड़े बड़े सेमिनार हुए। सरकारों में मंथन हुआ। लेकिन नतीजा फलदायी नहीं। क्योंकि स्कूल के नाम पर व्यवसाय कर रहे लोग सुनने को तैयार नहीं। ऐसा नहीं है की सारे स्कूल एक जैसे हैं लेकिन ज्यादातर ऐसे जरूर हैं जो अपनी मनमानी करते हैं। प्रबन्धन बिना रिसर्च के अपनी बात थोपते हैं। प्रशिक्षित टीचर्स की भारी कमी है। कम वेतन और ज्यादा काम के बोझ तले दबे अध्यापक अध्यापिकाएं दुनिया के बदलाव को खुद ही समझकर लागू करेंगी ये उम्मीद भी ठीक नहीं। इन्हें मैनेजमेंट का आदेश लागू करना करना होता है। हालांकि कुछ अध्यापक इन दबावों के बावजूद खुद बहुत काबिल होते हैं। इसका असर बच्चों पर दिखता है। कुछ प्रिंसिपल अपने अनुभव से स्कूल का वातावरण बेहतर बनाते हैं। लेकिन इनके हाथ में पूरा सिस्टम नहीं है। इसलिए सिस्टम का बदलाव बहुत जरुरी है। सरकारों को स्कूल लॉबी के कुचक्र को तोडना होगा। सरकार की किसी भी मजबूत और सार्थक पहल का स्वागत करना चाहिए। हम सभी को बचपन बचाना होगा। सरकारों को इस तरह की नीति बनानी होगी जिसे मानने के लिए सरकारी ही नहीं निजी स्कूल भी बाध्य हों। बच्चों का नैसर्गिक विकास हो। उनकी पहचान बनी रहे। वे खुद को बंधन और गैर जरुरी दबाव में महसूस न करें इसका ख्याल शिक्षा नीति का आवश्यक अंग होना चाहिए। स्कूल के साथ अभिभावको को भी अनावश्यक होड़ से बचना चाहिये। उन्हें इस बात की समझ विकसित करना चाहिए कि उनका बच्चा किस काम के लिए बना है।

अपनी उम्मीदों का बोझ उसपर मत डालिये। उनकी उम्मीदों को पूरा करने में सहायक बनिए। कोई भी बच्चा इसलिए आत्महत्या करे कि उसकी उम्मीद पूरी नहीं हुई,उसकी अपेक्षा में कहीं कमी रह गई। इसका मतलब है उसे उम्मीद विशेष टिह्रश्वपणी ञ्चसतपाल यादव का सही मतलब नहीं समझाया गया। उम्मीद वही होती है जो हमेशा जिन्दा रहे। एक -दो असफलताएँ इसे ख़त्म नहीं कर सकती। बल्कि बार बार असफल होने पर भी सफलता की ललक बाकी रहे यही उम्मीद है। याद रखिये हर बच्चा देश की अमूल्य विरासत है। उसे जिंदा रखना उसके अरमानो को जिंदा रखना हम सबकी जिम्मेवारी है। ...जय हिन्द





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