16/05/2017  :  11:22 HH:MM
लेकिन जवाब क्या है?
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भारत ने बीजिंग में हो रहे वन बेल्ट फोरम की बैठक का बहिष्कार किया है। भारत के एतराज वाजिब हैं। चीन का पाक कब्जे वाले कश्मीर में आर्थिक गलियारा बनाना बेशक भारत की संप्रभुता की अनदेखी करना है। साथ ही भारत को आशंका है कि चीन वन बेल्ट वन रूट (ओबीओआर) पहल के जरिए ऐसी विश्व आर्थिक व्यवस्था का निर्माण करना चाहता है, जिसमें वह सबसे बड़ी महाशक्ति होगा।

ऐसी संभावनाओं से भारत के कान खड़े होना निराधार नहीं है। मगर सवाल है कि इन परिस्थितियों का भारत के पास जवाब क्या है? आज हमारे सामने यह कड़वी हकीकत है कि इस मुद्दे पर भारत बिल्कुल अलग-थलग पड़ गया दिखता है। भूटान को छोडक़र भारत के तमाम पड़ोसी देश इस फोरम में भाग ले रहे हैं। यहां तक कि नेपाल ने भी इस परियोजना के तहत अपने देश में होने वाले निर्माण कार्य को लेकर चीन से करार कर लिया। वैश्विक स्तर भारत का ये अनुमान गलत साबित हुआ कि चीन के उदय से सतर्क अमेरिका इस परियोजना का विरोध करेगा। उलटे अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने बीजिंग बैठक में अपने प्रतिनिधिमंडल भेज दिए। ध्यानार्थ है कि सत्ता में आने के बाद एनडीए सरकार इन्हीं तीन देशों के साथ ऐसी धुरी बनाने की रणनीति पर चली, जिससे चीन की बढ़ती ताकत को संतुलित किया जा सके। फिर वियतनाम, दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया, फिलीपीन्स आदि भी इस सम्मेलन में भाग ले रहे हैं, जिनके- खासकर दक्षिण चीन सागर विवाद में- चीन से तनावपूर्ण रिश्ते रहे हैं। तो कुल मिलाकर चीन अपनी इस परियोजना को क्षेत्रीय एवं वैश्विक विवादों के असर बचाने में कामयाब हो गया है। ओबीओआर छह आर्थिक गलियारों की मिली-जुली परियोजना है, जिसमें रेलवे लाइन, सडक़, बंदरगाह और अन्य आधारभूत ढांचे बनाए जाएंगे। जाहिर है, जिन देशों के चीन से मधुर संबंध नहीं हैं, उन्होंने भी इससे होने वाले लाभों पर अपनी नजर रखी है। ओबीओआर में तीन ज़मीनी रास्ते होंगे, जिनकी शुरुआत चीन से होगी। चीन खुद अपने कोष तथा एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक से इन परियोजनाओँ के लिए कऱीब 60 लाख करोड़ रुपए उपलब्ध कराएगा। सवाल यही है कि इस परियोजना से अलग रहने
के बाद अब भारत के पास वैकल्पिक तैयारी क्या है? भारत ने समय रहते ऐसी कूटनीति क्यों नहीं की, जिससे चीन उसकी चिंताओं पर गौर करने के लिए मजबूर होता? एनडीए सरकार को इन प्रश्नों पर देश को भरोसे में लेना चाहिए।






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