हरियाणा मेल ब्यूरो
20/05/2017  :  09:20 HH:MM
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जुलाई में इजराइल की चिर-प्रतीक्षित यात्रा पर जाने वाले हैं। हालांकि इजराइल से भारत ने 1992 में ही राजनयिक संबंध बना लिए और उसके बाद से रक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों में दोनों देशों के रिश्ते लगातार प्रगाढ़ हुए हैं, मगर किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने अब तक इजराइल की यात्रा नहीं की। इसीलिए मोदी की प्रस्तावित यात्रा को बहुत महत्त्वपूर्ण समझा जा रहा है। इसे भारत की पारंपरिक विदेश नीति में बड़े बदलाव का सूचक भी माना गया है। आजादी के बाद से भारत की विदेश नीति फिलस्तीन के पक्ष में रही।

भारत ने हमेशा स्वतंत्र फिलस्तीनी राष्ट्र की वकालत की। चूंकि भारत इजराइल को मान्यता देने वाले आरंभिक देशों में था, इसलिए स्वतंत्र फिलस्तीन की पैरोकारी का सीधा मतलब दो राष्ट्रों के सिद्धांत को मानना था- यानी इजराइल और फिलस्तीन दोनों आजाद मुल्क के रूप में आसपास रहें। डोनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से पहले
तक अमेरिका और पश्चिमी देशों की भी यही नीति थी। ट्रंप ने इस नीति से हटने के संकेत दिए हैं। उनकी सोच चरमपंथी इजराइलियों के करीब है, जो फिलस्तीन राष्ट्र की स्थापना के विरोधी हैं। तो साफ है कि फिलस्तीन के मुद्दे पर दुनिया में एक नई परिस्थिति बनी है। इसी के बीच मोदी का इजराइल जाने का कार्यक्रम है। मोदी
सरकार भारत की विदेश नीति को अमेरिकी धुरी के करीब ले गई है। इजराइल से रिश्ता गहराना उसका स्वाभाविक परिणाम है। मगर चुनौती पश्चिम एशिया के उन मुस्लिम देशों से रिश्तों को बदस्तूर बरकरार रखने की भी है, जिनसे भारत के पारंपरिक संबंध रहे हैं। इन देशों की हमदर्दी फिलस्तीन के साथ है। तो प्रधानमंत्री की इजराइल यात्रा से पहले मोदी सरकार ने फि़लस्तीनी प्रशासन के प्रमुख महमूद अब्बास को आमंत्रित किया। उनके सामने मोदी ने दोहराया कि भारत एक स्वतंत्र, संप्रभु फिलस्तीनी राज्य की स्थापना का समर्थन करता है। इजराइल में अभी तक इस बात पर आम सहमति नहीं है कि स्वतंत्र फिलस्तीनी राज्य बने या नहीं- अथवा बने तो कितने इलाके पर। इजराइल यरुशलम को फिलस्तीनी राज्य की राजधानी बनाने के प्रति भी अनिच्छुक रहा है। इस मुद्दों पर बराक ओबामा के दौर में अमेरिका भी उसे राजी नहीं करा पाया, जब अमेरिका स्पष्टत: दो-राष्ट्र सिद्धांत का समर्थक था। इसलिए भारत का इस सिद्धांत के प्रति समर्थन दोहराना एक तरह की औपचारिकता ही है, हालांकि इससे ये अहम संदेश जरूर गया है कि मोदी सरकार ने इस मामले में अपनी नीति नहीं बदली है।





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