हरियाणा मेल ब्यूरो
17/07/2017  :  09:34 HH:MM
अमेरिका का अजीब खेल
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पांच सुन्नी देशों ने कतर से राजनयिक संबंध तोड़े तो ईरान ने उसके पीछे अमेरिका का हाथ बताया। तब यही माना गया कि इस कार्रवाई का रास्ता अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की सऊदी अरब यात्रा से खुला। लेकिन अब उसी अमेरिका ने आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए कतर से समझौता कर लिया है।
अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन की कतरी विदेश मंत्री शेख मुहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल-थानी से मुलाकात के दौरान ये समझौता हुआ। इसमें कट्टरपंथी संगठनों को वित्तीय मदद रोकने पर सहमति बनी। टिलरसन ने कहा- इस समझौते में उन कदमों का जिक्र है, जिन्हें दोनों देश आने वाले समय में उठाएंगे। इन कदमों का लक्ष्य वैश्विक स्तर पर जारी आतंकवादी गतिविधियों से निपटना है। बताया गया है कि अमेरिका भविष्य में ऐसे समझौते अन्य खाड़ी देशों के साथ भी करने वाला है। इस बीच पूरे हालिया विवाद में टिलरसन ने कतर के रवैये को उचित बताया। इस समझौते के बाद कतर से नाता तोडऩे वाले देशों के सुर बदले हैं। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मिस्र ने एक संयुक्त बयान में कहा है कि वे इस पर ध्यान रख रहे हैं कि कतरी प्रशासन हर तरह के आतंकवाद को रोकने के लिए क्या कर रहा है। इस बारे में केवल वादे करने भर से उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। बीते पांच जून को सऊदी अरब के नेतृत्व में कतर से सारे संबंध तोड़ लिए थे। उन्होंने कतर पर आतंकवाद को संरक्षण देने का आरोप लगाया था। 22 जून को इन देशों ने कतर को 13 मांगों की सूची सौंपी, जिसे कतर ने ठुकरा दिया। इन मांगों में कतर स्थित तुर्की का सैन्य अड्डा बंद करने की शर्त भी शामिल थी। मांगें मानने के लिए दी गई 10 दिनों की मियाद खत्म होने के बाद भी समयसीमा दो दिन और बढ़ाई गई। फिर भी कतर ने इन मांगों को नहीं माना। अब तक यही माना जा रहा था कि सऊदी अरब और उसके साथी देशों की पीठ पर अमेरिका का हाथ है। लेकिन अब अमेरिका ने कतर से समझौता कर लिया है। यहां उल्लेखनीय है कि पूरे खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका का सबसे बड़ा सैनिक अड्डा कतर में ही है। जाहिर है, कतर के साथ उसके स्वार्थ जुड़े हैं। वैसे ट्रंप के दौर की यही दिक्कत है। उनका प्रशासन कब क्या रुख लेगा, यह समझना किसी के लिए मुश्किल है।





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