समाचार ब्यूरो
17/09/2017  :  11:17 HH:MM
संबंधों का बहु-आयामी दायरा
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प्रधानमंत्री शिंजो आबे की यात्रा ने भारत-जापान संबंधों में नए आयाम जोड़े। अब तक आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग दोनों देशों के संबंधों का आधार था। लेकिन अब रक्षा और सुरक्षा में सहयोग भी उतना ही अहम हो गया है। संबंधों में जुड़े नए आयामों के पीछे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में उभरते नए समीकरणों की खास भूमिका है।
मसलन, चीन की बेल्ट और रोड पहल ने भारत और जापान को सशंकित कर रखा है। दोनों देश चीन के साथ सीमा विवाद में उलझे हुए हैं। भारत- चीन के बीच हाल ही में लगभग दो महीने चला दोकलाम विवाद इस स्थिति की ही एक मिसाल है। गौरतलब है कि दोकलाम गतिरोध के समय जापान ने खुल कर भारत का साथ दिया। एशिया में प्रभाव बढ़ाने की तेज होती होड़ के बीच चीन अपनी बेल्ट और रोड पहल के जरिए विभिन्न देशों को अपनी ओर मिलाने की कोशिश में है। मगर भारत और जापान इस दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहते। दोनों देशों का साझा ‘एशिया अफ्रीका विकास गलियारा’ (एएजीसी) इस दिशा में एक बड़ा कदम है। 40 अरब डॉलर की इस परियोजना में जापान 30 और भारत 10 अरब डॉलर का निवेश करेगा। दरअसल, भारत और जापान एशिया को बहुध्रुवीय बनाने के लिए कृत-संकल्प हैं। आपस में सामरिक और सैन्य सहयोग बढ़ाना इस सोच का ही एक परिणाम है। इसके अलावा बहुमुखी आर्थिक और व्यापारिक साझेदारी को ज्यादा-से-ज्यादा मजबूत करने की राह भी उन्होंने चुनी है। अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की कोशिश में भारत ने अमेरिका, फ्ऱांस और रूस समेत तमाम देशों के साथ परमाणु ऊर्जा सहयोग को खास महत्त्व दिया है। मगर इसमें उल्लेखनीय यह है कि जापान ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर न करने वाले किसी देश के साथ असहयोग की अपनी नीति भी भारत के लिए छोड़ दी। शिंजो आबे की नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के बाद से यह चौथी भारत यात्रा रही। वे भारत-जापान शिखर सम्मेलन के लिए आए। ये वार्ताएं अब तक हुए बारह शिखर सम्मेलनों के सिलसिले में रही हैं। जापान के अलावा भारत सिर्फ रूस के साथ वार्षिक शिखर बैठक करता है। दोनों देशों में यह समझ है कि भारत परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। देश की 50 फीसदी से ज्यादा आबादी 30 साल से कम उम्र की है। इसलिए भारत को निवेश की जरूरत है। जापान के पास पैसा और तकनीक है।






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