23/11/2016  :  16:22 HH:MM
प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन न हो : कृषि वैज्ञानिक
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दुनिया के कुछ प्रमुख कृषि वैज्ञानिकों ने खेती के लिए प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन पर गंभीर चिन्ता व्यक्त करते हुये फसलों की उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दिया है ताकि विश्व में खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। यहां आज से शुरू हुयी पांच दिवसीय चौथी अंतरराष्ट्रीय सस्य विज्ञान (एग्रोनामी) कांग्रेस में 22 देशों के वैज्ञानिकों ने कहा कि जलवायु परिवर्तन,भू-जल की कमी एवं इसकी गुणवत्ता में आ रही गिरावट, मिट्टी की उर्वरता में आ रही कमी, वनों की कटायी तथा समुद्र के जल स्तर में बढ़ोतरी,विश्व की बढ़ती आबादी की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती पेश कर रहे हैं।

प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक एम एस स्वामीनाथन ने कांग्रेस का उद्घाटन किया जबकि ट्रस्ट फार एडवांसमेंट आफ एग्रीकल्चरल साइंसेस (टास) के अध्यक्ष आर एस परोदा, अमेरिकन सोसाइटी आफ एग्रोनामी के अध्यक्ष पाल इ फिक्सन , आस्ट्रेलिया के एसीआईएआर के प्रधान सलाहकार जान डिक्सन, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक त्रिलोचन महापात्रा तथा कांग्रेस आयोजन समिति के प्रमुख एवं कृषि वैज्ञानिक चयन मंडल के अध्यक्ष गुर बचन ङ्क्षसह ने भी उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। डॉ स्वामीनाथन ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में यदि 1.5 डिग्री की वृद्धि होती है तो देश में बड़े पैमाने पर गेहूं का उत्पादन प्रभावित होगा । देश में कृषि में संतुलित उर्वरक के प्रयोग पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि प्रथम हरित क्रांति को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले पंजाब और हरियाणा में उत्पादन बढ़ाने के लिए अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया गया जिससे वहां मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हुयी है । सरकार ने मिट्टी जांच कार्ड योजना शुरू की है जिससे किसानों को सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी का पता चल सकेगा और संतुलित उर्वरक के प्रयोग को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि देश में किसानों को खेती के लिये ऋण व्यवस्था सही नहीं है जिससे वे ऋण के बोझ के तले दब जाते हैं और अंतत: आत्महत्या करने को मजबूर होते हैं । उन्होंने कहा कि भू-जल के अधिक दोहन के कारण महाराष्ट्र में पेयजल का संकट हो गया है जबकि अनेक स्थानों पर पानी की गुणवत्ता में गिरावट आयी है। वर्षा जल के संरक्षण पर जोर देते हुये उन्होंने कहा कि समुद्र का जल स्तर बढऩे से उसके किनारे रहने वाले लोगों के विस्थापन का खतरा हो सकता है।
डॉ स्वामीनाथन ने पंजाब और हरियाणा में धान के अवशेष जलाने के कारण दिल्ली में प्रदूषण पर गंभीर चिन्ता व्यक्त करते हुये कहा कि कृषि अवशेष से ऐसे उत्पाद तैयार किये जाने चाहिये जिसका सामान्य जनजीवन में उपयोग किया जा सके । फसलों के अवशेष जलाये जाने से मिट्टी की गुणवत्ता तो प्रभावित होती ही कुछ मित्र कीट भी नष्ट हो जाते हैं । धान के अवशेष में शीरा और यूरिया मिलाकर जानवरों के लिए पौष्टिक चारा बनाया जा सकता है ।






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