समाचार ब्यूरो
22/09/2017  :  10:55 HH:MM
परले दर्जे का पक्षपात
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तमिलनाडु विधानसभा के अध्यक्ष पी. धनपाल ने पहले दर्जे का पक्षपात भरा व्यवहार किया। दल-बदल विरोधी कानून के प्रावधानों पर गौर करें, तो उनके इस व्यवहार का कोई औचित्य नजर नहीं आएगा। विधानसभा अध्यक्ष ने दिनाकरण गुट के 18 विधायकों की सदस्यता इसी कानून के तहत रद कर दी। ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कडग़म (एआईएडीएमके) के ये विधायक शशिकला के समर्थक थे। यह गुट मुख्यमंत्री ई. पलानीस्वामी और उप-मुख्यमंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम का विरोध कर रहा है।
तमिलनाडु की 234 सदस्यीय विधानसभा में एआईएडीएमके के 132 सदस्य थे। 18 सदस्यों को अयोग्य करार देने के बाद अब सत्तारुढ़ दल के विधायकों की संख्या घट कर 116 रह गई है। मगर साथ ही तमिलनाडु विधानसभा में प्रभावी सदस्य संख्या 215 हो गई है। (पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के निधन के बाद उनकी आरके नगर विधानसभा सीट अभी खाली है।) ऐसे में बहुमत के लिए जरूरी आंकड़ा 108 हो गया है, जो एआईएडीएमके सत्तारुढ़ दल के पास मौजूद है। इस तरह विधानसभा अध्यक्ष ने पलानीस्वामी सरकार पर मंडराते खतरे को टालने की कोशिश की है। मगर पेच यह है कि जिन सदस्यों की सदस्यता खारिज हुई, उन्होंने विधानसभा के अंदर पार्टी के किसी निर्देश (ह्विप) का उल्लंघन नहीं किया था। उन्होंने तमिलनाडु के राज्यपाल सी. विद्यासागर राव से मिल कर मुख्यमंत्री पलानीस्वामी की सरकार से समर्थन वापस लेने की चि_ी जरूर सौंपी थी। मगर सदन से बाहरी गतिविधि दल-बदल विरोधी कानून के दायरे में नहीं आती। इसीलिए विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका पर सवाल उठे हैं। आरोप लगा है कि उन्होंने एआईएडीएमके के एक गुट के हित में काम किया है। अब दिनाकरण गुट ने कोर्ट की पनाह ली है। उसे वहां से राहत मिल जाए, तो इसमें कोई हैरत नहीं होगी। किसी पीठासीन अधिकारी का ऐसा पहली बार व्यवहार सामने आया हो, ऐसा नहीं है। लेकिन अतीत की गलतियों से आगे की किसी गलती को वाजिब नहीं ठहराया जा सकता। दरअसल, दल-बदल विरोधी कानून के ऐसे ही दुरुपयोगों के कारण अब इसके औचित्य पर ही सवाल उठाए जाने लगे हैं। तमिलनाडु में अन्ना डीएमके के भीतर की घटनाएं वैसे भी सियासी जोड़-तोड़ और सत्ता लोलुपता की पराकाष्ठा हैं। विधानसभा अध्यक्ष ने इन्हें और विद्रूप बना दिया है। चूंकि इन घटनाओं के पीछे भाजपा का हाथ समझा गया है, इसलिए सवालों के घेरे में उसका नेतृत्व भी आया है।






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