समाचार ब्यूरो
24/09/2017  :  10:22 HH:MM
चुने उसे जो आकाओं की नहीं, आपकी बात करे
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गु डगांव नगर निगम चुनाव आज होने हैं। किसी भी मुद्दे पर संवाद करने से पहले मैं अपील करना चाहता हूं कि बड़ी संख्या में घरों से निकलकर मतदान करें। यह आपके नगर,आपके मोहल्ले की दिशा तय करने का प्रश्न है। अगले पांच साल अपने गिले शिकवे-समस्याएं किसे हम सहजता से सुना सकते हैं।

कौन हमारी बात सुनकर समस्याओं के निस्तारण में मदद कर सकता है। किसके पास यह विजन है कि हमारी जरूरतों के मुताबिक कार्ययोजना बना सके और उसे व्यावहारिक रूप से अमल में लाने का रास्ता खोज सके। निश्चित रूप से किसी भी उम्मीदवार के पक्ष या विपक्ष में मतदान करने से पहले हमें इन सवालों के जवाब 
से खुद को संतुष्ट करना होगा। मैं गुडगांव के भविष्य को लेकर आशान्वित भी हूं और चिंतित भी। आशान्वित इसलिए हूं कि हमारे जो भी प्रतिनिधि चुनाव लड़ रहे हैं उन्हें यहां की जरूरतों के बारे में जानकारी है। वे रोजमर्रा की दिक्कतों से दो-चार हो रहे हैं। इसलिए उन्हें पता है क्या करना है और कैसे करना है। इसलिए वे एक
बेहतर कार्ययोजना बनाने और उसे अंजाम देने में सक्षम हैं। लेकिन चिंतित इसलिए हूं कि पता तो पहले भी लोगों को था। यहीं पले-बढ़े लोग पार्षद से लेकर महापौर, विधायक और सांसद बने। लेकिन तमाम दावों के बावजूद शहर की सेहत नहीं सुधरी। सडक़ों पर जाम कभी भी यहां के लोगों की जान आफत में डाल देता है। अगस्त में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर शहर में आए। चौबीस घंटे बिजली देने का वादा किया। लेकिन चार से पांच घंटे तक बिजली की कटौती हो रही है। पानी, सीवर की समस्या भी गंभीर है। सडक़ों की डिजाइन खटकने वाली है। लोगों को हर बिंदु पर समस्याओं से दो चार होना पड़ता है। गुडगांव को सिंगापुर या शंघाई बनाने का दावा करने वालों से सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या चंद इमारतों में मल्टीनेशनल कंपनियों के दफ्तर ख्ुालने भर से हमारे गुडगांव की तस्वीर बदल जाएगी। शायद नहीं। हमें गुडगांव के हर कोने की समस्याओं को समझना होगा। इस तरह की कार्ययोजना बनानी होगी जिससे हमारा शहर प्रदूषण मुक्त, साफ सुथरा
व्यवस्थिति बने। कचरा प्रबंधन, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्रणाली से लेकर शहर को सुंदर बनाने के लिए सडक़,बिजली पानी,परिवहन को दुरुस्त करने की एमग्र नीति बनानी होगी।

पंचायतों, नगर निगमों, स्थानीय निकायों तक सत्ता के विकेंद्रीकरण की बातें सही मायने में जमीन पर असर दिखाएंगी जब स्थानीय स्तर पर कार्ययोजना बनाने से लेकर उसके अमल तक का जिम्मा स्थानीय निकायों को दिया जाए। साथ में जवाबदेही भी तय हो। स्थानीय निकायों, नगर निगमों का उचित तरीके से ऑडिट हो। इस बात का पता लगाया जाए कि स्थानीय स्तर पर नेतृत्व योजनाओं को सही तरीके से जमीन तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं या फिर अपने राजनीतिक आकाओं की कृपा से संसाधन जुटाने और उनकी जड़ें मजबूत करने के लिए ऊल जुलूल हरकतों का अड्डा मात्र रह गए हैं। मुझे चिंता होती है जब नगर निगम के चुनाव भी स्थानीय मुद्दों से इतर पार्टी की विचारधाराओं और अपने राजनीतिक आकाओं के प्रभाव में लडऩे की कोशिश होती है। सही मायने में यह स्थानीय स्तर पर जवाबदेही से बचने की शुरुआत होती है। अगर हम किसी उम्मीदवार का चुनाव उसके राजनीतिक आका के प्रभाव या दल के आभामंडल में करते हैं तो स्थानीय स्तर पर चुनाव लड़ रहे व्यक्ति के गुणदोष गौण हो जाते हैं। चुने जाने के व्यक्ति उस व्यक्ति की जवाबदेही अपने आका और दल के प्रति ज्यादा होती है। जनता की समस्याओं का पूरा नहीं कर पाने की तोहमत भी बाद में ऊपरवालों पर ही मढ़ी जाती है। मेरा मानना है कि स्थानीय चुनाव बड़े नेताओं या दलों की छाया में नहीं लड़ा जाना चाहिए। उम्मीदवार किसी दल का हो सकता है। वह राजनीतिक आकाओं के संपर्क में रह सकता है। लेकिन उसकी अपनी जवाबदेही तय होनी चाहिए। यह तभी होगा जब आप वोट करने से पहले ऊपर उठाए गए सवालों के आधार पर व्यक्ति का परीक्षण कर लेंगे। मुझे उम्मीद है कि हम लोकतंत्र के पैमाने पर खरे उतरेंगे। -जय हिंद






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