समाचार ब्यूरो
01/10/2017  :  10:51 HH:MM
जड़ से ख़त्म करो रैगिंग का रोग
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रै गिंग की वजह से गलगोटिया कॉलेज में एक छात्र का डिप्रेशन का शिकार होना और मौत को गले लगाना अफसोसजनक खबर है। सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश और स्पष्ट गाइड लाइन के कई साल बाद भी इस तरह की खबरें आना दु:खद भी है और आश्चर्यजनक भी।

देश की सर्वोच्च अदालत का आदेश अगर कई साल बीतने के बाद भी कॉलेज और विश्वविद्यालय पूरी तरह लागू करने में समर्थ नहीं हो पाएं हैं तो ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। कॉलेज का बयान आया है कि छात्र कॉलेज से अनुपस्थित रहता था। इसलिए उसकी रैगिंग होने का सवाल नहीं है। लेकिन परिजनों का ये बयान ज्यादा अहम है कि छात्र के कॉलेज न आने की वजह ही रैगिंग थी। वह रैगिंग से न सिर्फ परेशान था बल्कि मनोरोग का शिकार हो गया था। उसका डिप्रेशन धीरे-धीरे बढ़ता गया और उसने मौत को गले लगा लिया। पुलिस का कहना है कि छात्र के परिवार की ओर से कोई शिकायत नहीं की गई है। शिकायत आएगी तो जांच की जाएगी। हो सकता है परिवार के लोगों ने कोई शिकायत नहीं की हो लेकिन कानून प्रवर्तन एजेंसी को ऐसे मामलों का स्वत: संज्ञान लेकर परिवार से संपर्क करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने सभी कॉलेजों में रैगिंग को प्रतिबंधित करते हुए वर्ष 2009 में आर के राघवन कमेटी की सिफारिशों को लागू करने को कहा था। इसमे स्पष्ट निर्देश थे कि अगर रैगिंग का कोई भी मामला कॉलेज की संज्ञान में आये तो एफआईआर कॉलेज की ओर से ही लिखाई जानी चाहिए। इसलिए कॉलेज को भी पल्ला झाडऩे के बजाय देखना चाहिए था कि छात्र कॉलेज से दूर क्यों हो रहा था। आखिर कब तक शिक्षा को व्यापार बना चुके संस्थान हमारे मूल्यों, नियमों, कानूनों और संविधान की मूल भावना का मजाक उड़ाते रहेंगे। रेयान स्कूल में किसी नन्हे -मुन्हे बच्चे की मौत हो या फिर किसी कॉलेज की लापरवाही से रैगिंग जैसी घटनाएं किसी युवा की मौत की वजह बने। दुर्भाग्य से ये घटनाएं हमारी शिक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियों की ओर इशारा करती हैं। खासतौर पर निजी संस्थानों की बात करे तो यह जगजाहिर है कि वे लुभाने वाले एजेंडों से छात्रों को आकर्षित कर उनका दाखिला करते हैं। मोटी फीस उगाहना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। लेकिन कर्तव्य और जवाबदेही के मामले में ज्यादातर संस्थानों का ट्रैक रिकॉर्ड खराब है। सरकारें भी आंख मूंदकर उनकी मनमानी बर्दाश्त कर रही हैं। बहुत बवाल मचता है तो जांच कमेटियां बनती हैं।

जांच एजेंसी को मामला सौंप दिया जाता है। लेकिन क्या संस्थानों का ढर्रा बदल रहा है। अगर वे जिम्मेदारी नहीं समझते तो क्या हम उनमें कानून का डर पैदा कर पा रहे हैं। दरअसल इसमें सरकार ही नहीं आमलोगों की भी जिम्मेदारी उतनी ही है। बच्चों,छात्रों को जागरूक करना होगा कि उनके संरक्षण के लिए कदम-कदम
पर कानून मौजूद है। जब कभी भी उनके साथ कोई रैगिंग जैसी घटना हो। उन्हें लगे कि उनकी गरिमा के साथ कोई खिलवाड़ हो रहा है उन्हें अपने संस्थान, अभिभावक या कानून लागू करने वाली एजेंसियों से संपर्क करना चाहिए। शिकायतकर्ता की पहचान गोपनीय रखी जाए इस तरह के प्रावधान भी हैं। डरकर खुद को खत्म
करने की राह पर बच्चे, युवा न बढ़े इसके लिए उन्हें उनके अधिकारों के बारे में बताना होगा। हर स्तर पर नियामक संस्थाएं है। चाहे सीबीएसई हो या यूजीसी। स्कूल, कॉलेजों, विस्वविद्यालय में सतत कॉन्सलिंग के इंतजाम की निगरानी करना इनकी जिम्मेदारी है। हम सबको एक स्वस्थ,जागरूक, स्वावलंबी और निडर पीढ़ी
के निर्माण के लिए मिलकर प्रयास करना होगा। हमारे समाज के भीतर ही कठिनाइयां हैं। उन्हें दूर करने का संकल्प और जज्बा भी समाज को दिखाना होगा। लेकिन इसके लिए संवेदनशीलता अनिवार्य शर्त है। जब तक हम किसी घटना को इस नजरिए से देखेंगे कि ऐसा हमारे साथ नही हुआ है इसलिए हमारी कोई जिम्मेदारी नही। आप अपना ही नुकसान करेंगे। आपकी चुह्रश्वपी देर सबेर आपको भी मुश्किल में डाल सकती है। इसलिए अगर खुद पीडि़त नही भी हैं तो दूसरों को जागरूक करें। आइये मिलकर एक सभ्य व्यवस्था के निर्माण में भागीदार बनें। जहां हर बच्चा सुरक्षित हो। उसका भविष्य उज्ज्वल हो। रैगिंग का रोग जड़ से समाप्त हो ये संकल्प रावण के प्रतीकात्मक पुतला दहन से भी बड़ा धर्म बनना चाहिए। -जय हिंद






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