समाचार ब्यूरो
08/10/2017  :  11:13 HH:MM
14 वर्षों से प्रदेश शिशु मृत्यु दर में अग्रणी, आत्मचिंतन जरूरी !
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राजा प्रजा का पालक होता है और जैसा राजा वैसी प्रजा। ये कहावत पुरानी जरूर हो गयी पर इनमे बहुत गहरे अर्थ छिपे है। प्रजातंत्र में राजा जनता पर निर्भर होता भी हैं और होता ही हैं। पर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राजा जब अधिक दिनों तक सत्ता में रह जाता हैं तो उसे अहसास होता हैं की राज्य शांति से चल रहा हैं और होता भी हैं कारण बहुत दिनों का शासक निर्भीक होकर शासन करता हैं और उसे इतने अधिक सहायक हो जाते हैं जैसे निज़ाम के यहाँ उसकी पांच सौ औरतें थी उसे खुद नहीं पता था की कौन कौन उसकी औरतें थी।

इस प्रकरण में सरकार को इसीलिए चिंता नहीं की मरने वाले बच्चे उनके वोटर नहीं हैं। यदि वोटर होते तो तत्काल ध्यान जाता जैसे किसान आंदोलन में चिंता रही। हो सकता हैं की मुख्य मंत्री की जानकारी में यह न हो। कारण मुख्य मंत्री को इन बातों के लिए समय नहीं हैं। उनको उन योजनाओं में अधिक रूचि होती हैं जिसमे आय हो। स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला बाल विकास विभाग खर्चीले विभाग हैं, कमाऊ पूत हैं लाभ तत्काल नहीं न तो मिलता या दिखता।

बड़े आश्चर्य की बात हैं की शिशुओं की मौत की जिम्मेदारी किस विभाग की हैं यह निश्चित नहीं हैं। इसे स्वास्थ्य विभाग के अंतरगत माना जाय या महिला बाल विकास के अंतरगत। कोई भी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं। पर निरंतर मृत्यु दर बढ़ती जा रही हैं या मौतें हो रही और सब अपने अपने बचाव में हैं। तर्क अपने अपने होते हैं जो सही होते हैं। जिस विभाग में आया हुआ बजट का सही ढंग से खरच न किया जाए उसमे कौन दोषी हैं ? वर्ष 2015 -16 में केंद्र सरकार ने 925 करोड़ रूपए में से 760 करोड़ रुपये खरच हुए। वर्ष 2016 - 17 में बजट 1010 करोड़ का आवंटन हुआ था और खरच 796 करोड़ खरच किये। और मध्य प्रदेश में 47 प्रति हजार मृत्यु दर हैं जो सर्वाधिक हैं। प्रमुख सचिव स्वास्थ्य का कहना हैं की 45 त्न मृत्यु दर कुपोषण के कारण हैं। सरकार इन आकंडों की पुष्टि के कारण बताती हैं जल्दी उम्र में शादी का होना,अविकसित शिशु प्रसव, जल्दी गर्भधारण होना और गरीबों के यहाँ अधिक प्रसव होना। उपरोक्त बातों से यह स्पष्ट हो गया हैं की शिशु मृत्यु दर दो विभागों के बीच में होने से अधर में हैं। इसका अर्थ स्पष्ट हैं की सरकार जो भी खरच कर रही हैं वह समुचित ढंग से नहीं कर रही हैं। गुणवत्ता युक्त सामग्री का क्रय न होना। पदस्थ अधिकारी और कर्मचारियों द्वारा अपने उत्तर दायित्व का वहन न किया जाना, या उपभोक्ता द्वारा सही ढंग से उपयोग न करना। मध्य प्रदेश सरकार जिसे मन पसंद सरकार कहना उचित होगा। इस सरकार में जितना अधिक कसावट होती हैं उतना अधिक गिरावट होना निश्चित। अधिकांश कार्यकर्त्ता स्थानीय होते हैं जिनके ऊपर स्थानीय नेता की छत्र छाया रहती हैं। और खरीदी से लेकर वितरण में कई स्तर होते हैं उनकी पूर्ती करते करते सामग्री /औषधि कितनी पहुँच पाती हैं यह वितरणकर्ता या भगवान् ही जान सकता हैं। और हमारे शिव भगवान इतने अधिक व्यस्त रहते हैं की उनको पता नहीं हैं उनके राज्य में कुपोषण से कितनी अधिक मौतें हो रही हैं क्या यह प्रशंसनीय कदम कहा जाएगा।






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