हरियाणा मेल ब्यूरो
11/10/2017  :  10:07 HH:MM
अमिताभ का ‘अमिताभ’ हो जाना
Total View  20

यह तो दुनिया जानती है कि उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में 11 अक्टूबर 1942 को जन्में अमिताभ बच्चन सदी के महानायक हैं, परन्तु यह कम लोग ही जानते होंगे कि अमिताभ सिनेमाजगत की ऐसी कालजयी रचना हैं, जिन्होंने उन तमाम सीमाओं को वसी यानी विस्तारित किया है जो कि किसी भी कला जगत को बांधे रखने के लिए आवश्यक होती हैं। कला साधकों की तरह अभिनय को जीवन में उतारने वाले अमिताभ बच्चन चूंकि डॉ हरिवंश राय बच्चन और तेजी बच्चन की संतान हैं अत: उनमें संस्कारवान होने के तमाम गुण भी विद्यमान हैं।

यही वजह है कि सिनेमाजगत या उससे बाहर की दुनिया में अमिताभ पर जितने भी लोगों ने कीचढ़ उछालने का दुस्साहस किया वापस उनके चेहरे और दामन ही दागदार नजर आए। इससे ऐसा प्रतीत हुआ मानों अमिताभ ने अपने नाम को पारिभाषित कर दिया। अमिताभ कहते हैं कि सोशल मीडिया पर उन्हें जब लोग गालियां देते हैं तो वो उन्हें यह समझकर स्वीकार कर लेते हैं कि जिस तरह मॉं बचपन में अपने बच्चे को बुरी नजर से बचाने के लिए काला टीका लगा देती थी ठीक उसी तरह ये गाली देने वाले लोग मेरे को कोई बुरी नजर न लगे इसलिए काला टीका यानी बजरबट्टू बैठा देते हैं। इस प्रकार विरोधियों को भी सम्मान के साथ आईना दिखाने का काम अमिताभ बाखूबी करते नजर आ जाते हैं। मानों उनके अति कांतियुक्त व्यवहार से दुनिया प्रकाशवान हो रही हो। यही वजह है कि व्यक्तिवादी विचारधारा के प्रशंसक तो उन्हें इस सदी के भगवान के तौर पर पूजते तक हैं। एक ऐसा भगवान जो भले ही मनोकामनाएं पूरी न करता हो, लेकिन जिसके सम्मुख जाने से जीवन की कड़वाहट मिट जाती हो और आनंदित कर देने वाली रश्मियों का संचार होने लगता हो। इसलिए मंदिर बनाकर मूर्ति स्थापित करने वालों को यूं तो अमिताभ खुद भी सलाह देते हैं कि वो ऐसा न करें क्योंकि ईश्वर के सदृश्य या समतुल्य किसी इंसान को मान लेना पाप है, लेकिन क्या किया जाए यह मानव स्वभाव है कि जहां से आत्मसंतुष्टि होती है वहां तमाम दायरे खुद व खुद खत्म हो जाते हैं। इसलिए उनके मना करने के बावजूद अमिताभ लाखों-करोड़ों दिलों की आस्थावान धडक़न बने हुए हैं। बहरहाल यह वह पक्ष है जो अमिताभ के बाहरी आभामंडल और उनके तेज को प्रदर्शित करता है, जबकि दूसरा पक्ष जिस वजह से वो पूरे संसार में अपने आपको स्थापित करते हैं वो उनका अपना जीवन्त अभिनय है, जिसे वो आत्मा के केंद्र में ले जाकर जीते हैं। इसलिए उनका बोलना-चालना तो दूर उनके उठने-बैठने से लेकर आंखों के खोलने और बंद करने या हाथों एवं पैरों के उठाने या किसी दिशा में लहरा देने मात्र से पूरी कहानी दर्शक समझ जाते हैं। अंग-अंग संवाद
करता प्रतीत होता है, इसलिए सत्तर के दशक में अमिताभ की जो छवि एंग्री यंगमेन वाली बनी वह किसी भी कीमत पर धूमिल नहीं होती। ऐसे कला साधक ने जब फिल्म सात हिन्दुस्तानी से सिने जगत में कदम रखा तो लोगों ने हाथो-हाथ लिया जिससे आभासित हुआ कि मानों फिल्मी दुनिया को ही नहीं बल्कि कला प्रेमियों और दर्शकों को भी काफी लंबे अर्से से उनका इंतजार था, इसलिए उनकी पहली फिल्म ने ही राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने जैसा इतिहास भी रचा। जीवन के उतार-चढ़ाव के बीच अमिताभ ने आनंद, ज़ंजीर, अभिमान, दीवार, शोले, त्रिशूल, मुकद्दर का सिकंदर, कुली, सिलसिला, अमर अकबर एंथोनी, काला पत्थर, अग्निपथ, बाग़बान, मोहब्बतें, ब्लैक, चीनी कम और पा जैसी फिल्में देकर बतला दिया कि वाकई जहां वो खड़े होते हैं लाइन वहीं से शुरु होती है। अभिनय के जरिए बुलंदियों को अपने कद से नापने के लिए समालोचकों और विचारकों को मजबूर करते अमिताभ जब छोटे पर्दे पर कौन बनेगा करोड़पति पर आते हैं तो खिलाडय़िों के प्रति उनकी आत्मीयता देखते ही बनती है। हॉट सीट पर उनके सामने बैठने वाला प्रतियोगी मानों उनका अपना ही कोई करीबी है जिसकी जिंदगी से वो कुछ तरह बावस्ता हैं कि तमाम दु:खों को हरना चाहते हैं और खुशियों से उसका दामन भरना चाहते हैं। ऐसे में उनका सवाल करना और फिर खिलाड़ी को उत्तर देने के लिए प्रोत्साहित करना मंच ही नहीं बल्कि टीवी के सामने बैठे दर्शकों को भी एकबारगी आंखों की नमी को छुपाने के लिए मजबूर कर देते हैं। इससे पहले अमिताभ ने बिग बॉस और आज की रात है जिंदगी जैसे हिट सीरियल भी किए हैं।

अमिताभ अभिनय के साथ ही साथ अपनी जानदार और वजनदार आवाज के लिए भी जाने जाते हैं। उनकी इस आवाज के दीवाने सत्यजीत रे जैसे फिल्मी जगत के युगसृष्टा भी रहे हैं। यही वजह है कि सत्यजीत रे ने जब शतरंज के खिलाड़ी फिल्म बनाई तो उन्होंने अमिताभ की आवाज को इस्तेमाल किया, जिसकी अक्सर चर्चा हो जाती है। यह अलग बात है कि अमिताभ को इस बात का मलाल आज भी है कि सत्यजीत रे के साथ काम करने का सपना उनका अधूरा ही रह गया। बहरहाल अमिताभ बच्चन जिन्हें कि भारत सरकार ने वर्ष 2005 में पद्मश्री और पद्म भूषण तथा वर्ष 2015 में पद्म विभूषण से सम्‍मानित किया, आज ऐसा प्रतीत होता है मानों ये सम्मान अमिताभ का नाम अपने साथ लगने से खुद को सम्मानित पाते हैं। सिनेजगत की इस कालजयी रचना को जब-जब पढऩे और समझने की कोशिश की जाती है, हर बार कुछ नया मिलता चला जाता है, इसलिए युग बदलते हैं लेकिन इनकी उपयोगिता किसी भी कीमत पर कम नहीं होती। ऐसे कला साधक के जीवन की रौशनी यूं ही संसार को प्रकाशवान करती रहें इसी उम्मीद के साथ जन्मदिन की ढेरों बधाईयां। -जय हिंद!






Enter the following fields. All fields are mandatory:-
Name :  
  
Email :  
  
Comments  
  
Security Key :  
   5070026
 
     
Related Links :-
मानसिक प्रदूषण ही पर्यावरण प्रदुषण हैं!
ऐश्वर्ययुक्त जीवन शैली की लालसा त्यागने का लें दृढ़ संकल्प
आतंकवाद पर दंश देता अमेरिका और पाकिस्तान
सकारात्मक सोंच के साथ बदलाव जरूरी
प्रथम सत्याग्रही विनोबा
दिल्ली की हवा पर एनजीटी की तलवार
फारुक अब्दुल्ला की बात पर गौर करें
प्रद्युम्न की हत्या: कुछ सवाल
नोटबंदी और जीएसटी के दर्द को भुलाने आ गई ‘बेनामी’...?
इस्लामी देशों का नेता बनने की तुर्की की चाहत